हज़रत मौलाना डॉक्टर सईदुर रहमान आज़मी नदवी इल्म ओ फ़ज़्ल के पहाड़ थे: मौलाना बिलाल हसनी नदवी

मौलाना के पैग़ाम को आगे बढ़ाना वक़्त की अहम ज़रूरत है: मौलाना अब्दुल क़ुद्दूस हादी
ऑल इंडिया मुस्लिम इंटेलेक्चुअल सोसाइटी के ज़ेरे-एहतिमाम हज़रत मौलाना डॉक्टर सईदुर रहमान आज़मी नदवी रहमतुल्लाह अलैह की याद में ताज़ियती नशिस्त
सरकर्दा उलमाए किराम, सियासी रहनुमाओं, माहिरीन-ए-तालीम और मुख़्तलिफ़ शोबाजात-ए-ज़िंदगी से ताल्लुक़ रखने वाली मुमताज़ शख़्सियात की शिरकत
सोसाइटी के सदर मरहूम की इल्मी, रूहानी, तालीमी और मिल्ली ख़िदमात पर ख़िराज-ए-अक़ीदत

लखनऊ, 13 अक्टूबर 2026: ऑल इंडिया मुस्लिम इंटेलेक्चुअल सोसाइटी के ज़ेरे-एहतिमाम अपने साबिक़ सदर हज़रत मौलाना डॉक्टर सईदुर रहमान आज़मी नदवी रहमतुल्लाह अलैह की हयात, इल्मी मक़ाम और गुनागूँ ख़िदमात को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करने के लिए मुमताज़ पीजी कॉलेज, डालीगंज, लखनऊ के मौलाना राबे हसनी नदवी स्मार्ट सेमिनार हॉल में एक पुरवक़ार ताज़ियती नशिस्त मुनअक़िद हुई।

हज़रत मौलाना डॉक्टर सईदुर रहमान आज़मी नदवी रहमतुल्लाह अलैह एक अज़ीम रूहानी रहनुमा, मुमताज़ उस्ताद, हकीमाना अंदाज़ में दावत ओ तब्लीग़ करने वाले दाई, कसीरुत्तसानीफ़ मुसन्निफ़, शोला-बयान मुक़र्रिर और बावक़ार इदारा जाती क़ाइद थे। उनकी शख़्सियत का सबसे नुमायाँ पहलू उनकी वह शफ़क़त, मुहब्बत और दिलनवाज़ी थी जिसके ज़रिए वह बेशुमार अफ़राद की ज़िंदगियों में इल्म ओ मआरिफ़त की रौशनी, क़ल्बी सुकून, हौसला और इत्मीनान पैदा करते रहे। उनके इंतिक़ाल से इल्मी दुनिया एक ऐसी मुमताज़ शख़्सियत से महरूम हो गई जिसके असरात उनके ज़ेरे-ख़िदमत इदारों की हुदूद से कहीं आगे तक फैले हुए थे और जिसकी इल्मी ओ रूहानी फ़ैज़रसानी से तलबा, उलमा, दानिशवरों और मुस्लिम मुआशरे की मुतअद्दिद नस्लें मुस्तफ़ीद होती रही थीं।

इस ताज़ियती नशिस्त में मुमताज़ उलमाए किराम, माहिरीन-ए-तालीम, दानिशवरों, सियासी रहनुमाओं, समाजी कारकुनों और मुख़्तलिफ़ मज़हबी ओ पेशेवराना शोबों से वाबस्ता नुमाइंदा शख़्सियात ने शिरकत की। मुक़र्रिरीन ने हज़रत मौलाना आज़मी नदवी रहमतुल्लाह अलैह की ग़ैरमामूली इल्मी ज़िंदगी, गहरी बसीरत, तवाज़ो, रूहानी सिफ़ात और हमाजिहत ख़िदमात का तज़किरा करते हुए क़ुरआन-ए-करीम, इस्लामी उलूम, तालीम ओ तरबियत, सहाफ़त, दावत ओ तब्लीग़, समाजी बहबूद और वसीअतर मुस्लिम उम्मत के लिए उनकी ज़िंदगी भर की ख़िदमात को ख़िराज-ए-तहसीन पेश किया। मुक़र्रिरीन ने बिलख़ुसूस दारुल उलूम नदवतुल उलमा, मजल्लतुल-बअसिल-इस्लामी, इंटीग्रल यूनिवर्सिटी, ऑल इंडिया मुस्लिम इंटेलेक्चुअल सोसाइटी और दीगर मुतअद्दिद तालीमी, दीनी ओ समाजी इदारों के साथ उनके दैरिना ताल्लुक़ और गिराँक़द्र ख़िदमात का ज़िक्र किया। इसके साथ ही हिंदुस्तान और दुनिया के मुख़्तलिफ़ ख़ित्तों में अफ़राद और इदारों की रहनुमाई के सिलसिले में उनके अहम किरदार को भी नुमायाँ किया गया।

प्रोग्राम का आग़ाज़ क़ुरआन-ए-करीम की तिलावत से हुआ, जिसकी सआदत डॉक्टर मौलाना मुहम्मद इदरीस नदवी ने हासिल की, जो ऑल इंडिया मुस्लिम इंटेलेक्चुअल सोसाइटी के सेक्रेटरी और शोबा-ए-अरबी, लखनऊ यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं। नशिस्त की निज़ामत सोसाइटी के नायब सदर मौलाना ज़की नूर अज़ीम नदवी ने अंजाम दी।
इस पुरवक़ार नशिस्त में दारुल उलूम नदवतुल उलमा के नाज़िम, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सेक्रेटरी, ऑल इंडिया पैग़ाम-ए-इंसानियत फ़ोरम के जनरल सेक्रेटरी और ऑल इंडिया मुस्लिम इंटेलेक्चुअल सोसाइटी के सरपरस्त हज़रत मौलाना सैयद बिलाल अब्दुलहय्य हसनी नदवी की शिरकत नुमायाँ रही। उनके अलावा हज़रत मौलाना हाफ़िज़ क़ारी अब्दुल क़ुद्दूस हादी साहब, जनरल सेक्रेटरी जमीयत उलमा उत्तर प्रदेश और क़ाज़ी कानपुर भी मौजूद थे।

दीगर मुमताज़ शुरका में डॉक्टर सैयद अम्मार रिज़वी, साबिक़ कारगुज़ार वज़ीर-ए-आला उत्तर प्रदेश, मुईद सिद्दीक़ी, साबिक़ वज़ीर उत्तर प्रदेश, मौलाना डॉक्टर मुहम्मद फ़रमान नदवी, मुदीर अल-बअसिल-इस्लामी, मौलाना अब्दुल्लाह मख़दूमी नदवी, मरहूम मौलाना के दामाद और उनके क़रीबी रुफ़क़ा में से एक, और डॉक्टर अता उर्रहमान आज़मी, फ़र्ज़ंद-ए-मरहूम और ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती लैंग्वेज यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर शामिल थे।

इस मौक़े पर प्रोफ़ेसर मुशीर हुसैन सिद्दीक़ी, साबिक़ सदर शोबा-ए-अरबी, लखनऊ यूनिवर्सिटी, सीनियर कांग्रेसी रहनुमा चचा अमीर हैदर, अरशद आज़मी, डॉक्टर अमजद सईद, नाज़िम जमात-ए-इस्लामी लखनऊ, डॉक्टर क्लब सब्तैन नूरी, डायरेक्टर यूनिटी कॉलेज, मौलाना सैफ़ अब्बास नक़वी, सदर मरकज़ी शिया चाँद कमेटी, शकील ख़ान, सदर उत्तर प्रदेश समाजवादी अक़ल्लियती तंजीम, और मौलाना सुफ़ियान निज़ामी, तरजुमान इस्लामिक सेंटर ऑफ़ इंडिया समेत मुतअद्दिद दीगर मुमताज़ शख़्सियात भी शरीक हुईं।

तिलावत-ए-क़ुरआन-ए-करीम के बाद पहले अहम ख़िताब में हज़रत मौलाना डॉक्टर सईदुर रहमान आज़मी नदवी रहमतुल्लाह अलैह के क़रीबी और शागिर्द मौलाना डॉक्टर मुहम्मद फ़रमान नदवी ने मरहूम की हयात, इल्मी इर्तिक़ा और इस्लामी उलूम के लिए उनकी गिराँक़द्र ख़िदमात का तफ़सीली जायज़ा पेश किया। उन्होंने हज़रत मौलाना के मुमताज़ ख़ानदानी पस-ए-मंज़र का तज़किरा करते हुए उनके वालिद, दादा, भाइयों और चचाओं की इल्मी, दीनी और अदबी ख़िदमात को याद किया। उन्होंने वाज़ेह किया कि इल्म ओ दीन से मालामाल इस ख़ानदानी रिवायत को हज़रत मौलाना ने न सिर्फ़ आगे बढ़ाया बल्कि अपनी ग़ैरमामूली ख़िदमात के ज़रिए उसे ख़ानदानी हुदूद से निकालकर हिंदुस्तान और आलम-ए-इस्लाम की वसीअ इल्मी तारीख़ का एक अहम हिस्सा बना दिया।

मौलाना फ़रमान नदवी ने बिलख़ुसूस मजल्लतुल-बअसिल-इस्लामी के क़ियाम और उसकी तरक़्क़ी से मुताल्लिक़ हालात ओ वाक़िआत पर रौशनी डाली। उन्होंने इस इल्मी तहरीक, तारीख़ी पस-ए-मंज़र और उन मुख़्लिसाना इल्मी कोशिशों का ज़िक्र किया जिनके नतीजे में हज़रत मौलाना आज़मी नदवी और मौलाना मुहम्मद अल-हसनी रहमतुल्लाह अलैह ने इस रिसाले को इस्लामी फ़िक्र, इल्मी मुबाहिस और फ़िक्री रहनुमाई के एक मोअस्सिर प्लेटफ़ॉर्म की शक्ल देने में अहम किरदार अदा किया। उन्होंने नदवतुल उलमा के लिए हज़रत मौलाना की ख़िदमात, इंटीग्रल यूनिवर्सिटी की तरक़्क़ी में उनके तआवुन और उनके तालीमी ओ फ़िक्री मिशन के मुख़्तलिफ़ मराहिल पर भी तफ़सील से गुफ़्तगू की। मौलाना फ़रमान नदवी ने उन्हें ऐसी हमाजिहत शख़्सियत क़रार दिया जिनकी इल्मी ओ फ़िक्री ख़िदमात किसी एक इदारे तक महदूद नहीं रहीं बल्कि उनसे तलबा, उलमा और तालीमी इदारों की मुतअद्दिद नस्लें मुस्तफ़ीद होती रहीं।

ताज़ियती नशिस्त का एक निहायत रक़तआमेज़ हिस्सा मौलाना अब्दुल्लाह मख़दूमी नदवी की गुफ़्तगू पर मुश्तमिल था, जो हज़रत मौलाना के दामाद और उनके इंतिहाई क़रीबी रुफ़क़ा में से थे। वह कई दहाइयों तक उनके क़रीब रहे और उनकी रोज़मर्रा ज़िंदगी, ज़रूरियात और देखभाल के मामलात से गहरा ताल्लुक़ रखते थे। उन्होंने अपनी ज़ाती यादों के ज़रिए इस अज़ीम आलिम की ज़िंदगी के आख़िरी अय्याम का एक जज़्बाती नक़्शा पेश किया, जिनकी पूरी ज़िंदगी इल्म, ईमान और ख़िदमत के लिए वक़्फ़ रही।
मौलाना अब्दुल्लाह मख़दूमी नदवी ने नुमायाँ जज़्बात के साथ याद किया कि उनके ज़ाती एहसास के मुताबिक़ हज़रत मौलाना अपने इंतिक़ाल से दो तीन रोज़ क़ब्ल ही गोया इस दुनिया से रुख़्सत होने की तैयारी फ़रमा रहे थे। वह बार-बार अपनी किताबों और घर के अफ़राद की तरफ़ एक ग़ैरमामूली जज़्बाती निगाह से देखते थे। अपने आस-पास की मुख़्तलिफ़ चीज़ों को छूते और अपने बच्चों को अपने पास बुलाते थे। बज़ाहिर कोई ख़ास ज़रूरत न होने के बावजूद उन्होंने अपने नाख़ुन तरशवाए, दाढ़ी और बालों को दुरुस्त करवाया और साफ़-सुथरे कपड़े ज़ेब-ए-तन फ़रमाए।

मौलाना अब्दुल्लाह मख़दूमी ने मज़ीद बताया कि हज़रत मौलाना कई माह से शदीद अलील थे और बीमारी की शिद्दत के बाइस भी उनकी ज़ाहिरी हालत निहायत साफ़-सुथरी, तरोताज़ा और बावक़ार दिखाई दे रही थी। उन्होंने कहा कि हज़रत मौलाना आज़मी नदवी रहमतुल्लाह अलैह की वफ़ात के वक़्त उनकी यह कैफ़ियत वहाँ मौजूद अफ़राद के ज़ेहनों पर गहरा नक़्श छोड़ गई। उनके लिए यह एक निहायत रक़तआमेज़ और नाक़ाबिल-ए-फ़रामोश याद थी, जो उस वक़ार, पाकीज़गी और सलीक़े की अक्कासी करती थी जिसके साथ उन्होंने अपनी ज़िंदगी गुज़ारी थी।
हज़रत मौलाना के फ़र्ज़ंद और ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती लैंग्वेज यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉक्टर अता उर्रहमान आज़मी ने अपनी ज़िंदगी के मुतअद्दिद ज़ाती वाक़िआत बयान किए, जिनसे उनके वालिद की एहसास-ए-ज़िम्मेदारी, नज़्म ओ ज़ब्त, दियानतदारी और इदारा जाती उसूलों से ग़ैरमामूली वाबस्तगी नुमायाँ होती है।

उन्होंने अपने तालिब-इल्मी के ज़माने का एक वाक़िआ बयान किया, जब वह नदवतुल उलमा में ज़ेरे-तालीम थे और टाइफ़ाइड में मुब्तला होकर तेज़ बुख़ार में मुब्तला हो गए थे। वालिद-ए-मुहतरम ने जब उनकी हालत देखी तो एक शफ़ीक़ बाप की तरह सबसे पहले उनकी सेहत के बारे में दरयाफ़्त किया। लेकिन डॉक्टर अता उर्रहमान आज़मी के मुताबिक़, इसके फ़ौरन बाद हज़रत मौलाना ने बतौर प्रिंसिपल इदारे के नज़्म ओ ज़ब्त और ज़िम्मेदारी का मामला सामने रखा।
डॉक्टर अता उर्रहमान आज़मी ने कहा कि इस वाक़िआ से वाज़ेह होता है कि उनके वालिद ने कभी अपने बेटे के साथ ज़ाती ताल्लुक़ को इदारे की ज़िम्मेदारियों और उसूलों पर असरअंदाज़ नहीं होने दिया। अपने घर के फ़र्द के मामले में भी वह उन्हीं क़वाइद ओ ज़वाबित और नज़्म ओ ज़ब्त की पाबंदी चाहते थे जो इदारे के हर फ़र्द के लिए यकसाँ थे।

अपने सदराती ख़िताब में हज़रत मौलाना सैयद बिलाल अब्दुलहय्य हसनी नदवी ने हज़रत मौलाना डॉक्टर सईदुर रहमान आज़मी नदवी रहमतुल्लाह अलैह को ‘इल्म ओ फ़ज़्ल का कोह-ए-गिराँ’ क़रार दिया। उन्होंने कहा कि हज़रत मौलाना आज़मी नदवी का इंतिक़ाल सिर्फ़ नदवतुल उलमा, अल-बअसिल-इस्लामी और दीगर उन मुमताज़ इदारों के लिए बड़ा नुक़सान नहीं है जिनसे उनका गहरा ताल्लुक़ रहा, बल्कि यह पूरी मुस्लिम उम्मत और आलम-ए-इस्लाम के लिए भी एक अज़ीम इल्मी ख़सारा है। उनके बक़ौल, ऐसी बुलंदपाया इल्मी ओ फ़िक्री शख़्सियत की रहलत से जो ख़ला पैदा हुआ है, उसे पुर करना आसान नहीं होगा।
मौलाना सैयद बिलाल अब्दुलहय्य हसनी नदवी ने हज़रत मौलाना की ख़िदमात और इल्मी विरसे को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हुए उन्हें दारुल उलूम नदवतुल उलमा की तहरीक की रूह और उसके बुनियादी मुहर्रिकात में से एक क़रार दिया। उन्होंने कहा कि हज़रत मौलाना आज़मी नदवी हक़ीक़ी मअनों में “तहरीक-ए-नदवा की जीती-जागती तस्वीर” थे। उनकी ज़िंदगी, तर्ज़-ए-अमल और उम्र-भर की वाबस्तगी में नदवतुल उलमा के मक़ासिद, तालीमी फ़लसफ़े और इल्मी ओ फ़िक्री मिशन की मुकम्मल अक्कासी होती थी।

वह महज़ नदवतुल उलमा से वाबस्ता एक आलिम नहीं थे, बल्कि इस इदारे की इल्मी रिवायत के मुस्तनद तर्जुमान और उसके तालीमी ओ फ़िक्री विज़न के हक़ीक़ी नुमाइंदों में शुमार होते थे। इदारे से उनकी वाबस्तगी सिर्फ़ रस्मी ज़िम्मेदारियों तक महदूद नहीं थी, बल्कि उनकी मुसलसल इल्मी जद्दोजहद, उसूलपसंदी और उनकी रहनुमाई से फ़ैज़याब होने वाली नस्लों में भी उसका इज़हार होता था।
मौलाना बिलाल अब्दुलहय्य हसनी नदवी ने मज़ीद कहा कि हज़रत मौलाना आज़मी नदवी अपनी पूरी ज़िंदगी इस इदारे और उसके मिशन के लिए मुख़्लिसाना तौर पर वक़्फ़ रहे। उन्होंने नदवतुल उलमा के तईं अपनी ज़िम्मेदारियों और अहद को पूरी दियानतदारी से निभाया और अपने पीछे इख़्लास, इल्म, वफ़ादारी और ख़िदमत की एक रौशन रिवायत छोड़ी।

मरकज़ी शिया चाँद कमेटी के सदर और मुमताज़ शिया आलिम-ए-दीन मौलाना सैफ़ अब्बास नक़वी ने डॉक्टर अता उर्रहमान आज़मी की जानिब से बयान करदा उस उसूल की ख़ुसूसी ताईद की, जिसमें हज़रत मौलाना आज़मी नदवी के इदारा जाती ज़िम्मेदारियों से मुताल्लिक़ नज़रिये को बयान किया गया था। उन्होंने कहा कि हज़रत मौलाना का यह एलान कि क़ौम की ख़िदमत के लिए क़ायम किए गए इदारों को कभी ज़ाती या ख़ानदानी मिल्कियत नहीं समझा जा सकता, आला दर्जे की अवामी अख़लाक़ियात, बे-लौसी और इदारा जाती दियानतदारी की बेहतरीन मिसाल है।
मौलाना सैफ़ अब्बास नक़वी के मुताबिक़, यह उसूल इस हक़ीक़त की अक्कासी करता है कि तालीमी और समाजी इदारों को क़ायम करने या उनकी क़ियादत करने वाले अफ़राद पर किस क़दर बड़ी ज़िम्मेदारी आइद होती है। जब ऐसे इदारे क़ौम की फ़लाह ओ बहबूद के लिए क़ायम हो जाएँ तो उन्हें अपने अस्ल मक़सद के लिए वक़्फ़ रहना चाहिए, न कि उन्हें ज़ाती या ख़ानदानी मफ़ादात के हुसूल का ज़रिया बनाया जाए। उन्होंने कहा कि उसूलपसंदी, अख़लाक़ी इस्तिक़ामत और बे-लौसी की ऐसी वाज़ेह मिसालें पेश करने वाली शख़्सियात आज के दौर में कम होती जा रही हैं, इसी लिए हज़रत मौलाना आज़मी नदवी की ज़िंदगी और उनका तर्ज़-ए-अमल मौजूदा मुआशरे के लिए ख़ुसूसी अहमियत रखता है।

जमीयत उलमा उत्तर प्रदेश के जनरल सेक्रेटरी और क़ाज़ी कानपुर मौलाना हाफ़िज़ क़ारी अब्दुल क़ुद्दूस हादी ने मुमताज़ उलमा की तालीमात, अक़दार और इल्मी विरसे को महफ़ूज़ रखने की अहमियत पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि कोई भी क़ौम उस वक़्त तक ख़ैर ओ भलाई के रास्ते पर क़ायम रह सकती है जब तक वह अपने मुख़्लिस उलमा और रहनुमाओं के नाम, तालीमात और उनकी रौशन रिवायतों को ज़िंदा रखती है। ऐसी शख़्सियात को याद करने का मक़सद सिर्फ़ ग़म का इज़हार नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके पैग़ामात को समझने, महफ़ूज़ करने और अमली ज़िंदगी में आगे बढ़ाने की संजीदा कोशिश भी होनी चाहिए।
मौलाना हादी ने इस बात पर तश्वीश का इज़हार किया कि मुमताज़ उलमा और मिल्ली रहनुमा यके-बाद-दीगरे दुनिया से रुख़्सत होते जा रहे हैं। इस सूरत-ए-हाल में नई नस्ल को उनकी ज़िंदगियों, किरदार और ख़िदमात से वाक़िफ़ कराना पहले से ज़्यादा ज़रूरी हो गया है। उन्होंने कहा कि ऑल इंडिया मुस्लिम इंटेलेक्चुअल सोसाइटी जैसे इदारों की यह अहम ज़िम्मेदारी है कि वह हज़रत मौलाना आज़मी नदवी जैसी शख़्सियात के इल्मी, फ़िक्री और अख़लाक़ी विरसे को महफ़ूज़ करें और उसे आम करें, ताकि उनकी ज़िंदगी से मिलने वाले सबक़ आने वाली नस्लों की रहनुमाई करते रहें।

साबिक़ कारगुज़ार वज़ीर-ए-आला डॉक्टर सैयद अम्मार रिज़वी ने हज़रत मौलाना डॉक्टर सईदुर रहमान आज़मी नदवी रहमतुल्लाह अलैह के इंतिक़ाल पर गहरे रंज ओ ग़म का इज़हार करते हुए कहा कि हज़रत मौलाना की वफ़ात इल्मी, दीनी और रूहानी दुनिया के लिए एक अज़ीम ख़सारा है। वह इल्म ओ फ़ज़्ल, तक़्वा ओ लिल्लाहियत, सादगी और बुलंद अख़लाक़ का ऐसा हसीन इम्तिज़ाज थे जिसने अपने मुआसिरीन ही नहीं, बल्कि आने वाली नस्लों के लिए भी रौशन मिसाल क़ायम की।
उन्होंने कहा कि हज़रत मौलाना ने अपनी पूरी ज़िंदगी तालीम ओ तदरीस, क़ुरआन ओ सुन्नत की ख़िदमत और नई नस्ल की इल्मी ओ अख़लाक़ी तरबियत के लिए वक़्फ़ कर रखी थी। उनकी शख़्सियत में इल्म की गहराई के साथ शफ़क़त ओ मुहब्बत, तवाज़ो और इंसान-दोस्ती नुमायाँ थी। वह अपने इल्म, किरदार और तर्ज़-ए-ज़िंदगी से लोगों के दिलों पर असर डालते थे।
डॉक्टर रिज़वी ने मज़ीद कहा कि हज़रत मौलाना जैसे अहल-ए-इल्म किसी एक इदारे या तबक़े का सरमाया नहीं होते, बल्कि पूरी मिल्लत और मुआशरे का क़ीमती असासा होते हैं। उनकी ख़िदमात, इल्मी आसार और तरबियतयाफ़्ता शागिर्द उनके लिए सदक़ा-ए-जारीया की हैसियत रखते हैं। उनकी जुदाई से पैदा होने वाला ख़ला आसानी से पुर नहीं किया जा सकता, ताहम उनके इल्मी ओ अख़लाक़ी नक़ूश हमेशा अहल-ए-इल्म और तालिबान-ए-हक़ के लिए मशअल-ए-राह रहेंगे।

उत्तर प्रदेश समाजवादी माइनॉरिटी सभा के सदर शकील ख़ान नदवी ने हज़रत मौलाना आज़मी नदवी के इंतिक़ाल पर गहरे रंज ओ ग़म का इज़हार किया और अवामी ओ सियासी ज़िंदगी में उनकी रहनुमाई को याद किया। उन्होंने कहा कि हज़रत मौलाना आज़मी नदवी की रहनुमाई की कमी उन तमाम अफ़राद को शिद्दत से महसूस होगी जो उनके मुतवाज़िन मशवरों, हिकमत ओ बसीरत और मुआशरे की फ़लाह ओ बहबूद के लिए उनकी फ़िक्र से मुस्तफ़ीद होते रहे थे।
उन्होंने इस बात को नुमायाँ किया कि मौजूदा हालात में मुआशरे को उसूलपसंद क़ियादत, बाहमी इफ़हाम ओ तफ़हीम और अवामी बहबूद के लिए मुख़्लिसाना जद्दोजहद की ज़रूरत है, और हज़रत मौलाना की मुतवाज़िन रहनुमाई इन हवाले से बड़ी अहमियत रखती थी।
इस ताज़ियती नशिस्त में एक निहायत ज़ाती और जज़्बाती ख़िराज-ए-अक़ीदत ऑल इंडिया मुस्लिम इंटेलेक्चुअल सोसाइटी के जनरल सेक्रेटरी डॉक्टर अम्मार अनीस नगरामी ने पेश किया। उन्होंने हज़रत मौलाना आज़मी नदवी के इंतिक़ाल को सिर्फ़ मुस्लिम मुआशरे का नुक़सान नहीं बल्कि अपने ख़ानदान के लिए एक गहरा ज़ाती सदमा क़रार दिया।

डॉक्टर अम्मार ने बताया कि उनके ख़ानदान का हज़रत मौलाना के साथ सात दहाइयों से ज़्यादा अरसे पर मुहीत क़रीबी ताल्लुक़ रहा है, जो पाँच नस्लों तक फैला हुआ था। इल्म, मुहब्बत, एहतराम और रूहानी रहनुमाई पर क़ायम यह ताल्लुक़ एक आलिम और उनके अक़ीदतमंदों के मामूल के रिश्ते से कहीं बढ़कर था।
अपने दोनों ख़ानदानों के इल्मी रवाबित का तज़किरा करते हुए डॉक्टर अम्मार ने अपने दादा, मुमताज़ मुफ़स्सिर-ए-क़ुरआन हज़रत मौलाना मुहम्मद ओवैस नगरामी का ज़िक्र किया, जिन्होंने नदवतुल उलमा में हज़रत मौलाना सईदुर रहमान आज़मी नदवी को तफ़सीर पढ़ाई थी। बाद की नस्ल में डॉक्टर अम्मार के वालिद प्रोफ़ेसर मुहम्मद यूनुस नगरामी ने भी नदवतुल उलमा ही में हज़रत मौलाना आज़मी नदवी से अरबी की तालीम हासिल की।
इस तरह नगरामी ख़ानदान और हज़रत मौलाना के दरमियान इल्म ओ मआरिफ़त का यह रिश्ता नस्ल-दर-नस्ल आगे बढ़ता रहा, जिसमें इल्मी इस्तिफ़ादे के साथ दैरिना मुहब्बत और क़ल्बी वाबस्तगी भी शामिल रही।

उन्होंने मज़ीद बताया कि हज़रत मौलाना को उनके साहबज़ादे अहमद नगरामी से भी बेपनाह मुहब्बत थी और वह उनकी भी रहनुमाई फ़रमाते रहे। डॉक्टर अम्मार ने यह भी याद किया कि उनकी पोती का नाम भी हज़रत मौलाना आज़मी नदवी ने तजवीज़ फ़रमाया था। इस तरह यह ताल्लुक़ पाँच नस्लों पर मुहीत एक मुनफ़रिद और गहरी वाबस्तगी की शक्ल इख़्तियार कर गया था।
डॉक्टर अम्मार के लिए ये यादें महज़ ख़ानदानी ताल्लुक़ की यादें नहीं थीं, बल्कि मुहब्बत, रहनुमाई और शफ़क़त की ऐसी रिवायत का हिस्सा थीं जो उनके ख़ानदान के साथ नस्ल-दर-नस्ल चलती रही थी।

हज़रत मौलाना डॉक्टर सईदुर रहमान आज़मी नदवी की हयात ओ ख़िदमात का तज़किरा करते हुए डॉक्टर अम्मार अनीस नगरामी ने नशिस्त को बताया कि ऑल इंडिया मुस्लिम इंटेलेक्चुअल सोसाइटी ने हज़रत मौलाना के इंतिक़ाल के फ़ौरन बाद उनके इल्मी विरसे को महफ़ूज़ करने, उसकी तदवीन और उसे आम करने के मक़सद से मुख़्तलिफ़ प्रोग्रामों और इल्मी ख़िराज-ए-अक़ीदत का सिलसिला शुरू कर दिया था।
उन्होंने बताया कि हज़रत मौलाना के इंतिक़ाल के कुछ ही अरसे बाद लखनऊ की मस्जिद इब्राहीमी, आगा मीर में मौलाना आज़ाद नदवी ने जुमे के ख़ुत्बे और ख़ुसूसी ख़िताब के ज़रिए हज़रत मौलाना की ज़िंदगी और ख़िदमात को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया। इस ख़िताब में इस्लामी उलूम और मिल्ली ख़िदमत के मैदान में उनकी नुमायाँ ख़िदमात पर रौशनी डाली गई।

इसके बाद सोसाइटी के हफ़्तावार दर्स-ए-क़ुरआन का एक ख़ुसूसी इजलास मुनअक़िद हुआ, जिसमें प्रोफ़ेसर डॉक्टर मुहम्मद इदरीस नदवी ने दर्स दिया। इस नशिस्त में हज़रत मौलाना की क़ुरआनी ख़िदमात और इल्मी मक़ाम पर तफ़सील से गुफ़्तगू की गई, बिलख़ुसूस क़ुरआन-ए-करीम के मुतालआ, तालीम ओ तदरीस और उसकी इशाअत के मैदान में उनकी उम्र-भर की ख़िदमात को उजागर किया गया।
डॉक्टर अम्मार ने मज़ीद बताया कि मौजूदा ताज़ियती नशिस्त भी इसी सिलसिला-ए-प्रोग्राम का एक हिस्सा है। उन्होंने एलान किया कि इंशाअल्लाह, ऑल इंडिया मुस्लिम इंटेलेक्चुअल सोसाइटी के ज़ेरे-एहतिमाम जल्द ही एक यादगारी किताब भी शाया की जाएगी, जिसमें हज़रत मौलाना डॉक्टर सईदुर रहमान आज़मी नदवी की हयात, इल्मी कारनामों और हमाजिहत ख़िदमात को दस्तावेज़ी शक्ल में महफ़ूज़ किया जाएगा।

इस मोज़ूआ किताब में मुमताज़ उलमाए किराम, दानिशवरों और नुमायाँ शख़्सियात के तास्सुरात, ख़िराज-ए-अक़ीदत और ताज़ियती पैग़ामात भी शामिल किए जाएँगे। इसका मक़सद आने वाली नस्लों के लिए एक ऐसा जामे इल्मी रिकॉर्ड तैयार करना है जिससे इस्लामी उलूम, तालीम और वसीअतर मुस्लिम मुआशरे पर हज़रत मौलाना के गहरे असरात को समझने में मदद मिले।
इन इक़दामात के ज़रिए ऑल इंडिया मुस्लिम इंटेलेक्चुअल सोसाइटी यह कोशिश कर रही है कि हज़रत मौलाना की याद को सिर्फ़ उनकी मुमताज़ ज़िंदगी के तज़करे तक महदूद न रखा जाए, बल्कि उसे आने वाली नस्लों के लिए इल्म, रहनुमाई, तरग़ीब और अमली इस्तिफ़ादे का ज़रिया भी बनाया जाए।
ताज़ियती नशिस्त में मुतअद्दिद दीगर मुक़र्रिरीन ने भी अपने रंज ओ ग़म का इज़हार किया और हज़रत मौलाना की शख़्सियत, इल्मी कारनामों और समाजी ख़िदमात के मुख़्तलिफ़ पहलुओं को याद किया।

इन शख़्सियात में मुईद सिद्दीक़ी, साबिक़ वज़ीर उत्तर प्रदेश; प्रोफ़ेसर मुशीर हुसैन सिद्दीक़ी, साबिक़ सदर शोबा-ए-अरबी, लखनऊ यूनिवर्सिटी, डॉक्टर यासिर अंसारी, सदर शोबा-ए-उर्दू, मुमताज़ पीजी कॉलेज, सदर मसीहा उर्दू सोसाइटी और मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के लखनऊ कैंपस के लाइब्रेरी असिस्टेंट डॉक्टर मसीहुद्दीन ख़ान, मौलाना सुफ़ियान निज़ामी, तरजुमान इस्लामिक सेंटर ऑफ़ इंडिया, डॉक्टर अमजद सईद, नाज़िम जमात-ए-इस्लामी लखनऊ और सीनियर कांग्रेसी रहनुमा अरशद आज़मी और चचा अमीर हैदर शामिल थे, जिन्होंने भी अपने ताज़ियती तास्सुरात पेश किए।
मुक़र्रिरीन ने हज़रत मौलाना आज़मी नदवी की इल्मी अज़मत, सादगी, फ़िक्री जुरअत, क़ुरआन ओ सुन्नत से गहरी वाबस्तगी, तालीम ओ सहाफ़त के लिए उनकी ख़िदमात और मुस्लिम मुआशरे की समाजी ओ अख़लाक़ी तरक़्क़ी के लिए उनकी ज़िंदगी-भर की फ़िक्र को ख़िराज-ए-तहसीन पेश किया। इन तास्सुरात से वाज़ेह हुआ कि हज़रत मौलाना की शख़्सियत का असर मुआशरे के मुख़्तलिफ़ तबक़ात तक फैला हुआ था। दीनी उलमा, माहिरीन-ए-तालीम, सियासी नुमाइंदों और समाजी रहनुमाओं के दरमियान उनकी क़द्र ओ मंज़िलत इस बात का सबूत थी कि उनकी ख़िदमात किसी एक इदारे, शोबे या तंजीम तक महदूद नहीं थीं।

ताज़ियती नशिस्त में मौलाना ख़ालिद रशीद फ़रंगी महली, चेयरमैन इस्लामिक सेंटर ऑफ़ इंडिया और इमाम ईदगाह का ताज़ियती पैग़ाम भी पढ़कर सुनाया गया। मौलाना ख़ालिद रशीद उमरे के मुक़द्दस सफ़र पर थे, इसलिए उन्होंने हरमैन शरीफ़ैन के मुक़द्दस सफ़र के दौरान अपना पैग़ाम इरसाल किया। अपने पैग़ाम में उन्होंने हज़रत मौलाना आज़मी नदवी के इंतिक़ाल पर गहरे रंज ओ ग़म का इज़हार करते हुए उसे अपना ज़ाती नुक़सान क़रार दिया।
इसी तरह इंटीग्रल यूनिवर्सिटी के चांसलर प्रोफ़ेसर सैयद वसीम अख़्तर का ताज़ियती पैग़ाम भी नशिस्त में पेश किया गया। उन्होंने हज़रत मौलाना के इंतिक़ाल पर गहरे दुख का इज़हार किया और उनके साथ अपने ज़ाती ताल्लुक़ के अलावा तालीम और यूनिवर्सिटी की तरक़्क़ी में उनकी ख़िदमात को याद किया।

इसी सिलसिले में अंजुमन फ़लाह दारैन के सदर मौलाना जहाँगीर आलम क़ासमी, जो अलालत के बाइस नशिस्त में शिरकत नहीं कर सके थे, ने अपने फ़र्ज़ंद मौलाना सलमान सिद्दीक़ी नदवी को ताज़ियती पैग़ाम के साथ भेजा। मौलाना जहाँगीर आलम क़ासमी ने अपने पैग़ाम में हज़रत मौलाना की दीनी, तालीमी और इल्मी ख़िदमात को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया और मुस्लिम मुआशरे के लिए उनकी ज़िंदगी-भर की गिराँक़द्र ख़िदमात का एतराफ़ किया।
इन पैग़ामात से भी उस एहतराम और क़द्र ओ मंज़िलत का इज़हार हुआ जिसके हामिल हज़रत मौलाना आज़मी नदवी मुमताज़ उलमा और इदारा जाती क़ाइदीन के दरमियान थे, ख़्वाह वह ज़ाती तौर पर ताज़ियती नशिस्त में शरीक न हो सके हों।
इस ताज़ियती नशिस्त में उलमा, दानिशवरों, माहिरीन-ए-तालीम, सियासी ओ समाजी शख़्सियात और मुख़्तलिफ़ इदारों व शोबा-ए-हयात से ताल्लुक़ रखने वाले अफ़राद की बड़ी तादाद ने शिरकत की।
शुरका में मौलाना सैयद अम्मार हसनी नदवी, सेक्रेटरी नदवतुल उलमा, लखनऊ; अंसाराम अली, साबिक़ चेयरमैन उत्तर प्रदेश माइनॉरिटीज़ कमीशन, सैयद सिराज मेहदी, साबिक़ रुक्न क़ानून साज़ काउंसिल, एडवोकेट बदरुल हसन और क़मर अली, साबिक़ रुक्न उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड शामिल थे।
इस मौक़े पर सीनियर सहाफ़ी तौसीफ़ हुसैन और नज्मुल हसन, नवीद अहमद, सेक्रेटरी वी हेल्प फ़ाउंडेशन और माहिरीन-ए-तालीम डॉक्टर देवेंद्र श्रीवास्तव, प्रिंसिपल नरोदेश्वर डिग्री कॉलेज और डॉक्टर दिनेश चौहान, प्रिंसिपल आदर्श डिग्री कॉलेज भी मौजूद थे।
दीगर समाजी कारकुनों और मुमताज़ शख़्सियात में मुर्तज़ा अली सिद्दीक़ी, हम्माद वहीद, इमरान क़ुरैशी, एजाज़ रिज़वी, हसन मतीन, हम्माद नगरामी, अली अनीस, तैय्यब नगरामी, मुहम्मद ख़ालिद अलमारूफ़ इशू, एडवोकेट असलम, हाफ़िज़ मिस्बाह नदवी, मौलाना नोमान अख़्तर नदवी, डॉक्टर सव्रत तक़ी और मौलाना नजीबुल हसन नदवी शामिल थे। इनके अलावा शहर लखनऊ के मुख़्तलिफ़ शोबा-ए-हयात से ताल्लुक़ रखने वाली सैकड़ों दीगर मुमताज़ शख़्सियात भी इस इज्तिमा में शरीक हुईं।
उलमाए किराम, माहिरीन-ए-तालीम, सियासी नुमाइंदों, समाजी कारकुनों और मुख़्तलिफ़ इदारों के नुमाइंदों की वसीअ शिरकत इस बात की अक्कासी करती थी कि हज़रत मौलाना आज़मी नदवी को मुआशरे के मुख़्तलिफ़ तबक़ात में किस क़दर एहतराम और क़द्र ओ मंज़िलत हासिल थी।
ताज़ियती नशिस्त का इख़्तिताम इस तजदीद-ए-अहद के साथ हुआ कि हज़रत मौलाना डॉक्टर सईदुर रहमान आज़मी नदवी की इल्मी, तालीमी, दीनी और इंसानी ख़िदमात के विरसे को महफ़ूज़ करने और आगे बढ़ाने के लिए मुसलसल कोशिशें जारी रखी जाएँगी।
शुरका ने इस बात पर ज़ोर दिया कि हज़रत मौलाना का पैग़ाम-ए-इल्म, ईमान, ख़िदमत, दियानतदारी और इज्तिमाई फ़लाह आने वाली नस्लों तक पहुँचना चाहिए। नशिस्त में इस ज़िम्मेदारी को भी उजागर किया गया कि तालीमी और फ़िक्री इदारे मुमताज़ उलमा के कारनामों को दस्तावेज़ी शक्ल में महफ़ूज़ करें और उनकी तालीमात को मौजूदा मुआशरे के लिए बामानी रहनुमाई में तब्दील करें।
यह इजलास महज़ इज़हार-ए-ग़म की एक नशिस्त नहीं था, बल्कि एक ऐसी अज़ीम इल्मी शख़्सियत के ग़ैरमामूली विरसे का इज्तिमाई एतराफ़ भी था जिसके असरात इदारों, नस्लों और मुआशरे के मुख़्तलिफ़ तबक़ात तक फैले हुए थे।
इस मौक़े पर पेश किए गए पुरख़ुलूस ख़िराज-ए-अक़ीदत, ज़ाती यादों और मुस्तक़बिल के लिए किए गए अज़ाइम ने इल्मी ओ रूहानी ज़िंदगी में हज़रत मौलाना आज़मी नदवी के पाएदार मक़ाम को नुमायाँ किया। उनका इल्म, इख़्लास, तवाज़ो, इदारा जाती दियानत और मुश्फ़िक़ाना रहनुमाई उन तमाम अफ़राद की यादों में हमेशा ज़िंदा रहेगी जिन्हें उनसे मुलाक़ात, इस्तिफ़ादे या उनकी इल्मी ख़िदमात से फ़ैज़याबी का मौक़ा मिला।
ऑल इंडिया मुस्लिम इंटेलेक्चुअल सोसाइटी की जानिब से उनकी ज़िंदगी और ख़िदमात को महफ़ूज़ करने और आम करने की कोशिशों के साथ इस उम्मीद का इज़हार किया गया कि हज़रत मौलाना की शख़्सियत में मौजूद आला उसूल, इल्मी बसीरत और ख़िदमत का जज़्बा आने वाली नस्लों के उलमा, तलबा, तालीमी इदारों और मिल्ली रहनुमाओं के लिए हमेशा मशअल-ए-राह साबित होगा।
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