दिल्ली प्रदर्शन, पत्रकारों की सुरक्षा और SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई: 46 याचिकाओं पर आज क्या हुआ? दिल्ली पुलिस ने मांगी बिना शर्त माफ़ी!

विशेष रिपोर्ट | 15 Oct-2026
दिल्ली में हालिया प्रदर्शनों, पुलिस की कार्रवाई, पत्रकारों की सुरक्षा, जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित किए जाने और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठे विवादों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक साथ जुड़ी 46 याचिकाओं पर सुनवाई की। उपलब्ध Bar & Bench रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगे, कई मामलों में नोटिस जारी किए और दिल्ली प्रदर्शनों से जुड़े CCTV फुटेज तथा अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया।
सुनवाई में एक ओर शांतिपूर्ण प्रदर्शन, प्रेस की स्वतंत्रता और पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही से जुड़े सवाल उठे, तो दूसरी ओर अदालत परिसर के आसपास राजनीतिक प्रदर्शनों, आम नागरिकों को होने वाली असुविधा और न्यायिक संस्थाओं की गरिमा से जुड़े मुद्दों पर भी विचार हुआ। अदालत ने इन विवादों पर तत्काल कोई व्यापक अंतिम फैसला देने के बजाय अलग-अलग याचिकाओं पर जवाब तलब करते हुए आगे की सुनवाई का रास्ता अपनाया।

1. एसआईआर और मतदाता सूची विवाद: चुनाव आयोग से जवाब तलब
सुनवाई का एक प्रमुख हिस्सा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं से जुड़ा था। Bar & Bench की 15 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी तथा विपक्षी गठबंधन INDIA के अन्य नेताओं की याचिका पर भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को नोटिस जारी किया।
याचिका में मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने और SIR प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को चुनौती दी गई है। अदालत ने इन याचिकाओं को विभिन्न राज्यों में SIR की वैधता से संबंधित पहले से लंबित मामलों के साथ जोड़ने का निर्देश भी दिया।

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की ओर से दायर याचिका पर भी निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया गया। ओवैसी की ओर से पेश अधिवक्ता निजाम पाशा ने आयोग के निर्णयों से संबंधित फाइल नोटिंग और अन्य रिकॉर्ड प्रस्तुत करने की मांग की।
यह विवाद निर्वाचन आयोग के निर्णय लेने की प्रक्रिया, मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने के मानकों तथा चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता जैसे महत्वपूर्ण सवालों से जुड़ा है। हालांकि, नोटिस जारी होने का अर्थ यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष के आरोपों को सही ठहरा दिया है। इन आरोपों पर आयोग का जवाब और आगे की न्यायिक समीक्षा महत्वपूर्ण होगी।
2. दिल्ली पुलिस की कार्रवाई और अदालत की अवमानना से जुड़े सवाल
दिल्ली में प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई तथा सुप्रीम कोर्ट के 9 और 11 अक्टूबर के अंतरिम निर्देशों के कथित उल्लंघन को लेकर भी सुनवाई हुई।
दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार ने अदालत में दाखिल दो हलफनामों में किसी भी संभावित गैर-अनुपालन के लिए बिना शर्त और स्पष्ट माफी मांगी। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अदालत के आदेशों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ था, विशेषकर जानबूझकर या दुर्भावनापूर्ण उल्लंघन नहीं हुआ।
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने माफी के संदर्भ में स्पष्टीकरण दिया और कहा कि सरकार तथ्यों के आधार पर अपनी कार्रवाई का बचाव कर रही है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने मीडिया में चल रही चर्चाओं के बजाय न्यायिक कार्यवाही पर ध्यान देने की बात कही। न्यायमूर्ति बागची ने भी माफी और सरकार के पक्ष के बीच प्रस्तुत स्पष्टीकरण पर टिप्पणी की।
इस कार्यवाही में मुख्य सवाल यह है कि पुलिस ने पूर्व में दिए गए न्यायिक निर्देशों का कितना पालन किया और क्या किसी स्तर पर उल्लंघन हुआ। पुलिस आयुक्त का पक्ष और याचिकाकर्ताओं के आरोप इस मामले में अलग-अलग दावे हैं; अंतिम निष्कर्ष अदालत की आगे की कार्यवाही पर निर्भर करेगा।

3. महिला पत्रकारों की सुरक्षा और प्रेस की स्वतंत्रता पर विशेष ध्यान
सुनवाई का एक महत्वपूर्ण पहलू दिल्ली में प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग कर रहीं महिला पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़ा रहा। Network of Women in Media, India (NWMI), Delhi Union of Journalists (DUJ) और Free Speech Collective की ओर से पत्रकारों के कथित उत्पीड़न, दुर्व्यवहार और पेशेवर काम में बाधा से संबंधित मुद्दे उठाए गए।
वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अदालत के सामने महिला पत्रकारों को प्रदर्शन स्थलों पर होने वाली कथित प्रताड़ना और विशेष सुरक्षा की आवश्यकता का विषय रखा। इस पर पीठ ने ऐसी शिकायतों की जांच के लिए एक समिति गठित करने की संभावना पर सहमति जताई। मुख्य न्यायाधीश ने संकेत दिया कि समिति में मुख्य रूप से या पूरी तरह महिलाएं शामिल हो सकती हैं, जिनमें पूर्व महिला न्यायाधीश, पूर्व महिला IPS अधिकारी या सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हों।
अदालत ने जयसिंह से प्रभावित पत्रकारों का विवरण और समिति के लिए प्रस्तावित नाम सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत करने को कहा।
एक महिला पत्रकार द्वारा पुलिस अधिकारी पर कथित दुर्व्यवहार का आरोप लगाए जाने और उसके विरुद्ध SC/ST अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज होने के मामले में अदालत ने फिलहाल उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया। पुलिस अधिकारी की ओर से प्राथमिकी दर्ज कराए जाने और पत्रकार के आरोपों से जुड़े तथ्यों की स्वतंत्र जांच अभी महत्वपूर्ण है।
इसी दौरान पत्रकारों के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को जब्त किए जाने के आरोप भी उठे। वरिष्ठ अधिवक्ता सी. यू. सिंह ने उपकरण लौटाने की मांग की, जबकि सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि पुलिस ने कोई उपकरण जब्त नहीं किया है। अदालत ने इस याचिका पर भी नोटिस जारी किया।
मुख्य न्यायाधीश ने पत्रकारिता को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पेशा चुनने के अधिकार, दोनों से संबंधित बताया। पीठ ने यह भी संकेत दिया कि मान्यता प्राप्त पत्रकारों, स्वतंत्र पत्रकारों, फ्रीलांसरों और डिजिटल सामग्री निर्माताओं की परिस्थितियों और उनके लिए लागू सुरक्षा के दायरे पर विचार किया जाएगा।

4. जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल से हटाने का मामला
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस आयुक्त के 11 अक्टूबर के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर भी नोटिस जारी किया, जिसके तहत जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित स्थिति से हटाने का मामला उठाया गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता ने दलील दी कि प्रदर्शन स्थलों को प्रशासनिक केंद्रों से दूर करने से शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(b) नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है, जो कानून के तहत उचित प्रतिबंधों के अधीन है।
सुनवाई में अदालत ने केंद्र सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि जंतर-मंतर से संबंधित निर्णय सुप्रीम कोर्ट की पूर्व मौखिक टिप्पणियों के आधार पर लिया गया था या प्रशासन ने स्थल की उपयोगिता और अन्य परिस्थितियों का स्वतंत्र आकलन किया था।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह निर्णय केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गठित समिति की सिफारिशों पर आधारित था और संबंधित प्रक्रिया अदालत की मौखिक टिप्पणियों से पहले शुरू हो चुकी थी। पीठ ने तत्काल रोक लगाने के बजाय केंद्र और दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा।
इस मामले में आगे का सवाल यह होगा कि सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिकों के आवागमन की जरूरतों के साथ शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार का संतुलन किस तरह बनाया जाता है।

5. सुप्रीम कोर्ट परिसर के पास राजनीतिक प्रदर्शन और न्यायपालिका की गरिमा
सुनवाई के दौरान चार अधिवक्ताओं की ओर से दायर उस याचिका पर भी नोटिस जारी किया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के आसपास जुलूसों तथा राजनीतिक प्रदर्शनों के लिए नियमन की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने कहा कि 12 अक्टूबर को राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं के सुप्रीम कोर्ट परिसर पहुंचने तथा कांग्रेस की केरल इकाई के सोशल मीडिया संदेशों को लेकर वकीलों ने आपत्ति जताई थी। उन्होंने इसे न्यायपालिका पर दबाव बनाने का प्रयास बताया।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायपालिका को दबाव में नहीं लाया जा सकता। हालांकि, अदालत ने इस स्तर पर आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से इनकार किया और स्पष्ट किया कि फिलहाल नोटिस जारी किया जा रहा है। संबंधित पक्षों के जवाब मिलने के बाद आगे विचार किया जाएगा।
यहां दो मुद्दों के बीच अंतर समझना आवश्यक है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा जरूरी है, लेकिन राजनीतिक आलोचना, शांतिपूर्ण विरोध और न्यायिक संस्थाओं के प्रति असहमति को लेकर किसी भी कार्रवाई का आधार कानून और संविधान होना चाहिए। अदालत के समक्ष इन दोनों पहलुओं के संतुलन का सवाल भी मौजूद है।

6. डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने का निर्देश और पुलिस शक्तियों की समीक्षा
प्रदर्शन के दौरान कथित हिरासत, पुलिस की कार्रवाई, वकीलों के साथ दुर्व्यवहार और अन्य घटनाओं से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए।
Bar & Bench की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने सभी कानून-प्रवर्तन एजेंसियों को दिल्ली प्रदर्शनों से संबंधित CCTV फुटेज और उनके पास मौजूद अन्य डिजिटल सामग्री सुरक्षित रखने का निर्देश दिया। निजी पक्षों को भी संबंधित डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने की अनुमति दी गई।
इस निर्देश का महत्व इसलिए है क्योंकि वीडियो रिकॉर्डिंग, CCTV फुटेज और अन्य डिजिटल सामग्री घटनाओं के क्रम, पुलिस कार्रवाई और संबंधित व्यक्तियों के आचरण की जांच में उपयोगी हो सकती है। हालांकि, किसी रिकॉर्डिंग की प्रामाणिकता, संदर्भ और साक्ष्य के रूप में स्वीकार्यता का निर्धारण संबंधित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही किया जाएगा।
अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 172 को चुनौती देने वाली याचिका पर भी नोटिस जारी किया। यह प्रावधान पुलिस को वैधानिक निर्देशों और निवारक कार्रवाई से जुड़ी शक्तियां प्रदान करता है। अदालत ने अपनी समीक्षा को विशेष रूप से इसी नए वैधानिक प्रावधान की संवैधानिक वैधता तक सीमित रखने की बात कही।
इसके अतिरिक्त, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA), सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) और अन्य अधिवक्ताओं की ओर से पुलिस थानों में कथित मारपीट तथा दुर्व्यवहार के आरोपों पर भी नोटिस जारी किए गए। इन आरोपों की जांच और संबंधित अधिकारियों के जवाब आगे की कार्यवाही में महत्वपूर्ण होंगे।

7. आम नागरिकों को हुई परेशानी और प्रदर्शन आयोजकों की जवाबदेही
प्रदर्शनों के कारण सार्वजनिक आवागमन, परिवहन सेवाओं और चिकित्सा संबंधी गतिविधियों पर कथित प्रभाव का मामला भी अदालत के सामने आया। एक याचिका में कहा गया कि प्रदर्शन के दौरान रास्ते बाधित होने से आम लोगों को परेशानी और आवश्यक सेवाओं में व्यवधान का सामना करना पड़ा।
पीठ ने केंद्र सरकार से इस सवाल पर जवाब मांगा कि यदि किसी प्रदर्शन के कारण आम जनता को नुकसान या गंभीर असुविधा होती है, तो आयोजकों की कानूनी और आर्थिक जवाबदेही किस सीमा तक तय की जा सकती है।
यह सवाल शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन से जुड़ा है। किसी प्रदर्शन से असुविधा होने का दावा अपने आप में आयोजकों को दोषी साबित नहीं करता। जवाबदेही तय करने के लिए वास्तविक नुकसान, संबंधित व्यक्तियों की भूमिका, लागू कानून और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करना आवश्यक होगा।
8. 46 याचिकाओं को श्रेणियों में बांटने का निर्देश
एक ही घटनाक्रम से संबंधित बड़ी संख्या में याचिकाओं के कारण सुनवाई में कई अलग-अलग कानूनी प्रश्न सामने आए। मुख्य न्यायाधीश ने वकीलों से बार-बार समान विषयों पर याचिकाएं दाखिल करने से बचने की अपील की।
अदालत ने दोनों पक्षों के लिए नोडल अधिवक्ताओं की नियुक्ति का निर्देश दिया, ताकि 46 याचिकाओं को अलग-अलग श्रेणियों में व्यवस्थित किया जा सके। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
- SIR और मतदाता सूची से संबंधित विवाद।
- दिल्ली में प्रदर्शनों पर प्रतिबंध और पुलिस कार्रवाई।
- पत्रकारों की सुरक्षा तथा प्रेस की स्वतंत्रता।
- हिरासत में कथित हिंसा और वकीलों के साथ दुर्व्यवहार।
- अदालत के पूर्व निर्देशों के अनुपालन से संबंधित अवमानना याचिकाएं।
पीठ ने केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और निर्वाचन आयोग सहित संबंधित पक्षों से जवाबी हलफनामे दाखिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, मामलों की सुनवाई संबंधित जवाबों और आगे की न्यायिक कार्यवाही के लिए स्थगित की गई।
निष्कर्ष: संवैधानिक अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन की परीक्षा
15 अक्टूबर 2026 की सुनवाई ने स्पष्ट किया कि दिल्ली प्रदर्शनों से जुड़े विवाद केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं हैं। इनमें मतदाता सूची की पारदर्शिता, निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया, पत्रकारों की सुरक्षा, शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था और न्यायपालिका की स्वतंत्रता जैसे व्यापक संवैधानिक प्रश्न शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग मामलों में नोटिस जारी किए, कुछ याचिकाओं को पहले से लंबित मामलों के साथ जोड़ा और डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया। लेकिन इन प्रक्रियात्मक कदमों को किसी पक्ष के आरोपों की अंतिम पुष्टि या दोष निर्धारण नहीं समझा जाना चाहिए।
आगे की सुनवाई में निर्वाचन आयोग, केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस के जवाबों के साथ उपलब्ध साक्ष्य महत्वपूर्ण होंगे। इनसे यह स्पष्ट होने में मदद मिल सकती है कि लगाए गए आरोपों के पीछे कौन-से तथ्य हैं और संबंधित प्रशासनिक या कानूनी निर्णयों की वैधता का आकलन किस आधार पर किया जाना चाहिए।
मूल संदर्भ एवं स्रोत
- Bar & Bench: Delhi protests and SIR — What the Supreme Court did today (15 October 2026) — 46 याचिकाओं की सुनवाई का विस्तृत विवरण।
- Bar & Bench: दिल्ली प्रदर्शन, पुलिस कार्रवाई और डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने के निर्देश।
- Bar & Bench: राहुल गांधी और INDIA गठबंधन की SIR याचिका पर ECI और CEC को नोटिस।
- Bar & Bench: महिला पत्रकारों की शिकायतों की जांच के लिए समिति पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी।
संपादकीय नोट: यह रिपोर्ट उपलब्ध Bar & Bench सामग्री के आधार पर तैयार की गई है।
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