एकरूप नियमों का अर्थ एक जैसे नियम नहीं है; भारत की विधायी विविधता का सम्मान जरूरी”: विजेन्द्र गुप्ता

“दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष श्री विजेन्द्र गुप्ता ने लैंगिक रूप से समानता पर आधारित संसदीय नियमों, संवैधानिक सुरक्षा और विधायी प्रक्रियाओं के आधुनिकीकरण पर दिया जोर
दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष ने वर्ष में कम से कम 30 बैठकें, डिजिटल नोटिस, विधेयकों की बेहतर जांच और पीठासीन अधिकारियों को अधिक प्रक्रियागत अधिकार देने का दिया सुझाव विधायी सुधार की दिशा में हरित पहल:
दिल्ली विधानसभा की कागजरहित बैठक से 18,000 से अधिक पन्नों की बचत, पानी का संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन में कमीमॉडल नियमों में दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी की अलग-अलग संवैधानिक व्यवस्थाओं को मान्यता मिलनी चाहिए:विजेन्द्र गुप्ता
प्रेस विज्ञप्ति
दिल्ली, 27 अक्टूबर 2026।“एकरूप नियमों का अर्थ एक जैसे नियम नहीं है। हमारा प्रयास साझा लोकतांत्रिक मानकों को मजबूत करना होना चाहिए, साथ ही प्रत्येक विधायिका की संवैधानिक स्वायत्तता और विशिष्ट पहचान को भी सुरक्षित रखा जाना चाहिए।” यह बात दिल्ली विधानसभा के माननीय अध्यक्ष श्री विजेन्द्र गुप्ता ने भारत की विधायी संस्थाओं में कार्य संचालन और प्रक्रिया की एकरूपता के लिए मॉडल नियम बनाने संबंधी समिति की बैठक में दिल्ली की ओर से सुझाव प्रस्तुत करते हुए कही। व्यापक संसदीय सुधारों की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि विधायी नियमों में महिला और पुरुष दोनों के लिए समानता पर आधारित भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए। सामान्य खंड अधिनियम, 1897 से जुड़ी पुरानी परंपराओं के कारण नियमों में प्रचलित पुरुषवाचक शब्दों के स्थान पर ऐसी भाषा अपनाई जानी चाहिए, जो आज के लोकतांत्रिक मूल्यों को दर्शाए। उन्होंने कहा कि नारी शक्ति का सम्मान भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं के नियमों में भी दिखाई देना चाहिए।इस बैठक की अध्यक्षता उत्तर प्रदेश विधानसभा के माननीय अध्यक्ष श्री सतीश महाना द्वारा की गई। बैठक में महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष श्री राहुल नार्वेकर, हिमाचल प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष श्री कुलदीप सिंह पठानिया और कर्नाटक विधानसभा के अध्यक्ष श्री जी.एस. पाटिल सहित वरिष्ठ विधायी अधिकारी और प्रतिनिधि उपस्थित थे।

सभी पीठासीन अधिकारियों का स्वागत करते हुए श्री गुप्ता ने 12 मई 2026 को मैसूर में हुई समिति की प्रारंभिक बैठक का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि पटना में आयोजित 85वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में साझा प्रक्रियागत ढांचा तैयार करने का निर्णय लिया गया था। उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय द्वारा तैयार प्रारूप रिपोर्ट की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि इस पहल का उद्देश्य नियमों में मौजूद अस्पष्टताओं की पहचान करना, अच्छी संसदीय परंपराओं से सीख लेना और संस्थागत स्तर पर ठोस सुधार करना होना चाहिए।पूरी बैठक कागजरहित तरीके से आयोजित की गई, जो विधायी संस्थाओं में डिजिटल व्यवस्था को अपनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। दिल्ली विधानसभा सचिवालय द्वारा किए गए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के अनुसार, दस्तावेजों के 12 सेट डिजिटल माध्यम से साझा किए गए। प्रत्येक सेट में 1,521 पृष्ठ थे। इस प्रकार कुल 18,252 कागज के पन्नों की बचत हुई। इससे अनुमानित रूप से लगभग 4.4 पेड़ों और 18,252 लीटर पानी की बचत हुई तथा कार्बन डाइऑक्साइड के समतुल्य उत्सर्जन में लगभग 182.5 किलोग्राम की कमी आई।संवैधानिक सुरक्षा पर जोर देते हुए श्री गुप्ता ने कहा कि मॉडल नियमों में दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर की अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

इन क्षेत्रों की विधायिकाएं संवैधानिक प्रावधानों और विशेष कानूनों के तहत काम करती हैं। इनमें राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार अधिनियम, 1991 भी शामिल है। उन्होंने द्विसदनीय विधायिकाओं के लिए उचित प्रावधान करने का सुझाव दिया, जिनमें विधान परिषदों, उनके पीठासीन अधिकारियों, सचिवालय के अधिकारियों और दोनों सदनों के बीच आपसी व्यवस्था से जुड़े विषय शामिल हों। उन्होंने अध्यक्ष और उपाध्यक्ष जैसे पीठासीन पदों के चुनाव, सभापति तालिका के नामांकन तथा अध्यक्ष के कार्यों को अन्य अधिकारियों को सौंपने की प्रक्रिया को स्पष्ट करने की आवश्यकता भी बताई। उन्होंने कहा कि सदन की गणपूर्ति यानी कोरम से संबंधित नियमों में बदलाव केवल कानून के माध्यम से ही किया जा सकता है। साथ ही, राष्ट्रपति, राज्यपाल और उपराज्यपाल के अभिभाषण से संबंधित संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधानों को अनावश्यक रूप से दोहराने से बचना चाहिए।विधानसभा की कार्यप्रणाली पर अपने विचार रखते हुए श्री गुप्ता ने बजट, मॉनसून और शीतकालीन सत्र सहित वर्ष में तीन सत्र आयोजित करने तथा सभी राज्य विधानसभाओं में सालाना कम से कम 30 बैठकें सुनिश्चित करने का समर्थन किया। यह विषय पीठासीन अधिकारियों के 86वें सम्मेलन में भी चर्चा के लिए आया था। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था को लागू करते समय कानून में पहले से निर्धारित अधिक बैठक संबंधी आवश्यकताओं और सदन में होने वाली सार्थक चर्चा की गुणवत्ता का ध्यान रखा जाना चाहिए। डिजिटल संसद, ई-विधान और राष्ट्रीय ई-विधान एप्लिकेशन (नेवा) के बढ़ते उपयोग को देखते हुए उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजे जाने वाले नोटिस, समन, याचिकाओं और अन्य प्रक्रियागत सूचनाओं को औपचारिक मान्यता देने का सुझाव दिया। उन्होंने सदस्यों की आधिकारिक सूची और प्रतिदिन की उपस्थिति पंजिका को अलग-अलग रखने तथा पहले से प्रभावी संसदीय व्यवस्थाओं को बनाए रखने की बात भी कही। कार्यवाही की शुरुआत में वंदे मातरम् और सत्र के समापन पर राष्ट्रगान जन गण मन के प्रस्तावित प्रावधान का स्वागत करते हुए उन्होंने बताया कि दिल्ली विधानसभा में पहले से ही इन परंपराओं का पालन किया जाता है।

संसदीय प्रक्रिया को अधिक लचीला और प्रभावी बनाने के लिए श्री गुप्ता ने शून्यकाल और विशेष उल्लेख के बीच अनावश्यक दोहराव से बचने, प्रत्येक बैठक में स्थगन प्रस्तावों की संख्या एक तक सीमित रखने तथा बहस की अवधि अध्यक्ष या सदन के विवेक पर छोड़ने का सुझाव दिया। उन्होंने स्थगित सदन की अगली बैठक बुलाने से पहले अनिवार्य रूप से पांच दिन का अंतर रखने के प्रस्ताव पर भी सवाल उठाया। विधेयकों की जांच को संसदीय सुधारों का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक विधेयक के साथ उसके वित्तीय, प्रशासनिक और कानूनी प्रभावों की जानकारी दी जानी चाहिए। इसमें वित्तीय ज्ञापन और विधायी शक्तियों को आगे सौंपने से संबंधित विवरण भी शामिल होने चाहिए। उन्होंने विधेयकों और उनके अधिकृत अनुवादों को पहले से डिजिटल माध्यम से उपलब्ध कराने तथा आवश्यकता के अनुसार उन्हें विशेषज्ञों की राय और जनता की प्रतिक्रिया के लिए प्रवर समितियों या विभाग-संबंधी स्थायी समितियों के पास भेजने का समर्थन किया।श्री गुप्ता ने कहा कि दिल्ली में कानूनों के अधिकृत अंग्रेजी पाठ से संबंधित वैधानिक आवश्यकता को बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने प्रक्रियागत नियमों में तत्काल छूट दिए जाने की स्थिति में उसका उचित रिकॉर्ड रखने पर भी जोर दिया जनभागीदारी बढ़ाने के लिए उन्होंने याचिका प्रपत्रों से पुराने औपनिवेशिक शब्दों को हटाने, क्षेत्रीय भाषाओं को मान्यता देने और प्रमाणित इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से याचिकाएं जमा करने की अनुमति देने का सुझाव दिया। उन्होंने दिल्ली विधानसभा की उस व्यवस्था का भी उल्लेख किया, जिसके तहत निजी सदस्यों को अपने प्रस्तावों की स्वीकार्यता की पहले से जांच के लिए नोटिस के साथ पूरा प्रस्ताव जमा करना होता है। विधेयकों को प्रमाणित करने में सचिव की विशेष परिस्थितियों में भूमिका का समर्थन करते हुए उन्होंने उचित कानूनी सुरक्षा बनाए रखने की आवश्यकता बताई।

उन्होंने स्पष्ट किया कि विधेयक का प्रमाणीकरण और उस पर स्वीकृति देना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। उन्होंने कहा कि वित्तीय कार्यवाही, संवैधानिक संशोधनों और अधीनस्थ विधायन से संबंधित नियम प्रत्येक विधायिका की संवैधानिक शक्तियों के अनुरूप होने चाहिए।संसदीय विशेषाधिकारों पर चर्चा करते हुए श्री गुप्ता ने निलंबन की अवधि को अधिकतम 30 दिन तक सीमित करने के प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि निलंबन और निष्कासन अलग-अलग कार्रवाई हैं तथा विधायी सदनों को कानून के दायरे में अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के अधिकार प्राप्त रहने चाहिए। इनमें कारावास और अन्य उपयुक्त दंड देने की शक्तियां भी शामिल हो सकती हैं। उन्होंने आचार संबंधी शिकायतों के निपटारे के लिए स्पष्ट प्रक्रिया बनाने, विशेष परिस्थितियों में विधानसभा कक्ष के अन्य उपयोगों की अनुमति देने के लिए अध्यक्ष को विवेकाधिकार प्रदान करने और प्रक्रियागत नियमों की व्याख्या के संबंध में अध्यक्ष के निर्णय को अंतिम मानने वाले प्रावधानों का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि स्थापित संसदीय परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन पुराने पड़ चुके प्रावधानों और प्रक्रियाओं की कमियों को भी दूर करना आवश्यक है। इस पहल के प्रति दिल्ली की प्रतिबद्धता दोहराते हुए श्री गुप्ता ने कहा कि एकरूपता की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि इससे विधायी जवाबदेही, लोकतांत्रिक विचार-विमर्श और जनता की सेवा करने की विधायिकाओं की क्षमता कितनी मजबूत होती है।
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