हाइफ़ा की लड़ाई को लेकर फ़िलिस्तीनी दूतावास का सवाल, क्या इतिहास को नए सिरे से लिखा जा रहा है?

23 सितंबर को ‘हाइफ़ा दिवस’ के संदर्भ में भारत में फ़िलिस्तीन के दूतावास ने भारत-फ़िलिस्तीन के साझा इतिहास को लेकर एक अहम सवाल उठाया है।
दूतावास का कहना है कि 1918 की हाइफ़ा की लड़ाई को केवल ‘हाइफ़ा की मुक्ति’ के तौर पर पेश करना ऐतिहासिक संदर्भ को अधूरा कर देता है। उसके मुताबिक़ उस समय भारतीय सैनिक ब्रिटिश इंडियन आर्मी का हिस्सा थे और ब्रिटिश कमान के तहत प्रथम विश्व युद्ध में फ़िलिस्तीन के क्षेत्र में अभियान का हिस्सा बने थे।
फ़िलिस्तीनी दूतावास ने अपने दस्तावेज़ में कहा है कि उस दौर में भारत स्वयं ब्रिटिश शासन के अधीन था और हाइफ़ा पर सैन्य कार्रवाई को ब्रिटिश साम्राज्यवादी युद्ध अभियान के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
दूतावास ने यह भी सवाल उठाया कि भारतीय सैनिकों की बहादुरी और बलिदान का सम्मान करते हुए क्या इस पूरे ऐतिहासिक संदर्भ को भी सामने नहीं रखा जाना चाहिए।
दूसरी तरफ़, 23 सितंबर को भारतीय सैन्य इतिहास में हाइफ़ा की लड़ाई में भारतीय घुड़सवार सैनिकों की वीरता को याद करने के दिन के तौर पर भी देखा जाता है। 1918 की इस लड़ाई में ब्रिटिश इंडियन आर्मी की भारतीय रियासतों से जुड़ी घुड़सवार टुकड़ियों ने अहम भूमिका निभाई थी।
यानी विवाद सिर्फ़ एक लड़ाई की तारीख़ या सैन्य उपलब्धि का नहीं, बल्कि इस बात का है कि उस इतिहास को किस संदर्भ और किस भाषा में याद किया जाए।
फ़िलिस्तीनी दूतावास ने लोगों से भारत-फ़िलिस्तीन संबंधों के इस अध्याय को मूल ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और तथ्यों के साथ समझने की अपील की है।
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