लोकतंत्र को सड़क के दबाव से नहीं, लोकतांत्रिक प्रक्रिया से निर्णय लेने दें

मोहम्मद आमिर
लोकतंत्र में असहमति का अधिकार मौलिक महत्व रखता है, लेकिन इसके साथ कुछ जिम्मेदारियाँ भी जुड़ी होती हैं। नागरिकों को संस्थाओं से सवाल करने, अपनी शिकायतें व्यक्त करने और जवाबदेही की मांग करने का पूरा अधिकार है। साथ ही, लोकतांत्रिक व्यवस्था ऐसे मामलों पर विचार और निर्णय के लिए निर्धारित प्रक्रियाएँ भी उपलब्ध कराती है। लोकतंत्र की मजबूती केवल विरोध-प्रदर्शन की स्वतंत्रता में नहीं, बल्कि इस स्वतंत्रता के जिम्मेदाराना इस्तेमाल में है।

किसी सार्वजनिक संस्था की आलोचना करने और किसी संवैधानिक पदाधिकारी के भविष्य का निर्णय करने में स्पष्ट अंतर है। कोई प्रदर्शन किसी मांग को व्यक्त कर सकता है, लेकिन वह स्वयं यह तय नहीं कर सकता कि कोई पदाधिकारी अपने पद पर बना रहे या इस्तीफा दे। ऐसे मामलों का निर्णय उन्हीं संस्थाओं और प्रक्रियाओं के माध्यम से होना चाहिए जिन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई है।

निर्वाचन आयोग भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उसके कामकाज से संबंधित चिंताओं की निश्चित रूप से जांच होनी चाहिए, बशर्ते उनके पीछे विश्वसनीय साक्ष्य हों। लेकिन जवाबदेही के लिए तथ्य, उचित कानूनी प्रक्रिया और संबंधित संस्थाओं को मामले पर विचार करने का अवसर आवश्यक है। महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों से जुड़े मामलों में संसद की अपनी जिम्मेदारियाँ हैं, जबकि न्यायालय कानूनी वैधता से जुड़े प्रश्नों की जांच कर सकते हैं। शिकायतें रखने के लिए अन्य कानूनी माध्यम भी उपलब्ध हैं।
इसी संदर्भ में 10 अक्टूबर को CJP द्वारा दी गई विरोध-प्रदर्शन की अपील को भी सावधानी से देखने की आवश्यकता है। जो लोग मानते हैं कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने कोई अनुचित कार्य किया है, वे अपने साक्ष्य उचित मंच के समक्ष प्रस्तुत करने और कानून के तहत उपलब्ध उपाय अपनाने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन ऐसे मामले को सड़क पर लामबंदी के माध्यम से तय करने का प्रयास संस्थागत प्रक्रिया की जगह जनदबाव को स्थापित करने का जोखिम पैदा करता है। कोई भी लोकतांत्रिक व्यवस्था तब प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकती, जब महत्वपूर्ण संस्थागत निर्णय किसी सभा के आकार या तीव्रता से तय होने लगें।

इसका एक व्यापक संबंध जनता के विश्वास से भी है। लोकतंत्र में संस्थाओं की आलोचना आवश्यक है, लेकिन यदि उन्हें लगातार टकराव के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाए तो इससे धीरे-धीरे पूरी व्यवस्था में जनता का विश्वास कमजोर हो सकता है। जवाबदेही का उद्देश्य संस्थाओं को मजबूत करना होना चाहिए, न कि यह धारणा पैदा करना कि उनके निर्णय तब तक वैध नहीं हैं, जब तक वे सड़कों पर उठने वाली मांगों के अनुरूप न हों।

मौलिक स्वतंत्रताओं के साथ नागरिक जिम्मेदारियाँ भी जुड़ी होती हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा महत्वपूर्ण अधिकार हैं, लेकिन उनका प्रयोग सार्वजनिक व्यवस्था और दूसरों के अधिकारों की रक्षा के लिए लागू कानूनी सीमाओं के भीतर होना चाहिए। शिकायत उठाने का अधिकार किसी व्यक्ति को कानूनी निर्देशों की अनदेखी करने का अधिकार नहीं देता।
यह बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण है यदि रिपोर्टों के अनुसार 10 अक्टूबर को प्रस्तावित सभा के लिए अनुमति नहीं दी गई है। ऐसी स्थिति में उस निर्देश के बावजूद प्रदर्शन करना गैर-जिम्मेदाराना होगा। नागरिकों की सामूहिक जिम्मेदारी है कि वे शांति बनाए रखें, सार्वजनिक व्यवस्था का सम्मान करें और कानूनी निर्देशों का पालन करें, भले ही वे उनसे सहमत न हों। ऐसे निर्देशों की अनदेखी को लोकतांत्रिक भागीदारी का श्रेष्ठ रूप नहीं कहा जा सकता।

किसी उचित शिकायत का अंत इस बात से नहीं हो जाता कि कोई विशेष प्रदर्शन अनुमति प्राप्त नहीं कर सका। शिकायत की प्रकृति के अनुसार उसे संसद, न्यायालयों, निर्वाचन प्राधिकरणों या अन्य सक्षम संस्थाओं के समक्ष रखा जा सकता है। ये माध्यम सुनिश्चित करते हैं कि परिणाम सड़क के दबाव के बजाय साक्ष्य और कानून के आधार पर तय हो।
10 अक्टूबर निकट है, इसलिए नागरिकों को ऐसे किसी आयोजन में शामिल होने से पहले गंभीरता से विचार करना चाहिए, जिसके लिए आवश्यक अनुमति प्राप्त नहीं हुई हो। हर असहमति को सड़कों पर ले जाने से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब नागरिक निडर होकर सवाल करें, जिम्मेदारी के साथ जवाबदेही की मांग करें और उन कानूनों तथा संस्थाओं का सम्मान करें जो सभी के अधिकारों की रक्षा करते हैं। संवैधानिक प्रश्नों का निर्णय संवैधानिक तरीकों से होना चाहिए, सड़कों पर नहीं।
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