Supreme Court Bench

वोटों की गिनती का वीडियो नहीं मिला तो सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को लगाई टकार,कहा‘अगली सुनवाई पर रिकॉर्ड पेश करें’

Supreme-Court-Bench-1024x576 वोटों की गिनती का वीडियो नहीं मिला तो सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को लगाई टकार,कहा‘अगली सुनवाई पर रिकॉर्ड पेश करें’
कर्नाटक के श्रींगेरी चुनाव विवाद में कांग्रेस नेता टी.डी. राजेगौड़ा की याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने मूल मतगणना की वीडियो रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं होने पर सवाल उठाए। वहीं, उत्तर प्रदेश में 85,854 मतदाता विलोपन फॉर्म में कारण दर्ज नहीं होने की खोजी रिपोर्ट ने मतदाता सूची पुनरीक्षण की पारदर्शिता पर नई बहस छेड़ी है।

नई दिल्ली | 14 अक्टूबर 2026

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में नाम हटाने की प्रक्रिया पर सवालों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के श्रींगेरी विधानसभा क्षेत्र से जुड़े चुनाव विवाद में आयोग से कड़े सवाल किए हैं। अदालत ने 2023 के विधानसभा चुनाव की मूल मतगणना की वीडियो रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं होने पर नाराजगी जताई और निर्देश दिया कि अगली सुनवाई पर उपलब्ध सभी रिकॉर्ड पेश किए जाएं। अदालत ने चेतावनी दी कि रिकॉर्ड पेश नहीं किए जाने पर आयोग के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जा सकता है।

यह मामला कांग्रेस नेता टी.डी. राजेगौड़ा और भाजपा उम्मीदवार डी.एन. जीवराज के बीच चुनावी विवाद से जुड़ा है। इसी बीच, उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता नाम हटाने के फॉर्म में कारण दर्ज न होने और कुछ मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने के कथित सामूहिक प्रयासों को लेकर भी सवाल उठे हैं। हालांकि, दोनों मामले अलग-अलग हैं और इन्हें एक ही न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

कर्नाटक चुनाव विवाद: 201 वोटों से जीते थे राजेगौड़ा

2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में श्रींगेरी सीट पर कांग्रेस के टी.डी. राजेगौड़ा ने भाजपा के डी.एन. जीवराज को 201 वोटों के अंतर से हराया था। जीवराज ने नतीजे को चुनौती दी। इसके बाद कर्नाटक हाईकोर्ट ने डाक मतपत्रों की दोबारा जांच और पुनर्गणना का आदेश दिया। मई 2026 में संशोधित नतीजे में जीवराज को विजेता घोषित कर दिया गया। राजेगौड़ा ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

14 अक्टूबर को न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की पीठ ने मूल मतगणना की वीडियो रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं होने पर चुनाव आयोग से सवाल किए। आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने बताया कि 2023 की मूल मतगणना का वीडियो खोजने के बावजूद नहीं मिल सका है।

अदालत ने सवाल किया कि चुनाव कराने वाली संस्था अपने ही रिकॉर्ड के गुम होने की बात कैसे कह सकती है। पीठ ने आयोग को उपलब्ध दस्तावेज और रिकॉर्ड अगली सुनवाई में पेश करने को कहा। मामले की अगली सुनवाई 15 फरवरी 2027 के लिए निर्धारित की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही विवादित पुनर्गणना के परिणाम के आधार पर उठाए गए कदमों पर रोक लगाई थी, जिससे याचिका लंबित रहने तक राजेगौड़ा विधायक बने रह सकें।

उत्तर प्रदेश में 85,854 फॉर्म पर सवाल क्यों उठे?

उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर The Reporters’ Collective की 9 अक्टूबर की खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया कि निर्वाचन आयोग के ERONET सॉफ्टवेयर से अधिकारियों के माध्यम से मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए 85,854 फॉर्म-7 तैयार हुए, जिनमें विलोपन का उचित कारण दर्ज नहीं था। रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों द्वारा दाखिल 87,127 फॉर्म में से 85,854 में कारण का उल्लेख नहीं था। फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची से किसी नाम को हटाने पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए होता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि उत्तर प्रदेश के कुछ विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने के लिए एक ही नाम से बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज की गईं। जांच के अनुसार, तरबगंज और पीलीभीत में संबंधित आपत्तियों का लगभग 90 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ था। रिपोर्ट में 200 से अधिक ऐसे प्रयासों का भी उल्लेख किया गया। ये खोजी रिपोर्ट के निष्कर्ष हैं; इनसे अपने आप यह साबित नहीं होता कि सभी संबंधित नाम गलत तरीके से हटाए गए या इसके पीछे कोई राजनीतिक साजिश थी।

उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी का क्या कहना है?

उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने रिपोर्ट को भ्रामक बताते हुए उसका खंडन किया। हालांकि, The Reporters’ Collective की 14 अक्टूबर की फॉलो-अप रिपोर्ट के अनुसार, उनके स्पष्टीकरण में सॉफ्टवेयर से फॉर्म तैयार होने और मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ सामूहिक आपत्तियों के कुछ आंकड़ों की पुष्टि भी हुई। दोनों पक्षों के बयानों के बीच यह सवाल बना हुआ है कि फॉर्म में आवश्यक कारण क्यों दर्ज नहीं थे और संबंधित प्रक्रिया नियमों के अनुरूप कैसे संचालित हुई।

रिपोर्ट के मुताबिक, इन खुलासों के बाद निर्वाचन आयोग ने एक व्यक्ति द्वारा बड़ी संख्या में विलोपन फॉर्म दाखिल करने पर सीमा भी लगाई। इस कदम को मतदाता सूची में आपत्तियों की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।

पारदर्शिता और जवाबदेही पर बहस

कर्नाटक में मतगणना का वीडियो उपलब्ध न होना और उत्तर प्रदेश में विलोपन फॉर्म के कारणों को लेकर उठे सवाल निर्वाचन प्रक्रिया में रिकॉर्ड सुरक्षित रखने, नियमों के पालन और पारदर्शिता की अहमियत को सामने लाते हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की कर्नाटक मामले में टिप्पणी को उत्तर प्रदेश के SIR पर फैसला नहीं माना जा सकता। उपलब्ध रिपोर्टों में इन दोनों मुद्दों पर कोई साझा न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

अब कर्नाटक मामले में अगली सुनवाई पर उपलब्ध रिकॉर्ड पेश किए जाने और उत्तर प्रदेश में विलोपन प्रक्रिया से जुड़े सवालों के स्पष्ट जवाब मिलने पर नजर रहेगी। मतदाता सूची की शुद्धता के साथ-साथ प्रत्येक मतदाता के नाम को हटाने की प्रक्रिया का कारण स्पष्ट होना भी चुनावी भरोसे के लिए महत्वपूर्ण है।

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