दिल्ली में उलेमा व मदरसा स्नातकों का अखिल भारतीय पांच दिवसीय सम्मेलन शुरू

समकालीन चुनौतियों के मद्देनज़र मजबूत बौद्धिक एवं वैचारिक नेतृत्व तैयार करने पर जोर

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नई दिल्ली, 21 अक्टूबर 2026: जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के केंद्रीय कार्यालय में ‘शोबा-ए-उलेमा व मसाजिद’ के तत्वावधान में उलेमा और मदरसों के स्नातकों का अखिल भारतीय पांच दिवसीय सम्मेलन शुरू हुआ। सम्मेलन में देश के विभिन्न हिस्सों और अलग-अलग विचारधारात्मक पृष्ठभूमि से जुड़े उलेमा ने हिस्सा लिया।

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अमीर सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा कि आज मुस्लिम समुदाय को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर अनेक चुनौतियों का सामना है। बड़े संकट अक्सर समाजों के लिए निर्णायक मोड़ साबित होते हैं और ऐसे समय में सही दिशा का चुनाव विकास और प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है।उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में उलेमा की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। उन्हें समुदाय की कमियों और गलतियों में सुधार, सही मार्गदर्शन तथा नए दौर के सवालों के समाधान तलाशने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। इसके लिए उलेमा में वैज्ञानिक, बौद्धिक और शोधपरक दृष्टिकोण विकसित होना जरूरी है। साथ ही उन्हें आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और समकालीन विषयों से भी परिचित होना चाहिए।

सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा कि पश्चिमी व्यवस्था की लंबे समय से आलोचना होती रही है और आज यूरोपीय देशों में भी वैकल्पिक व्यवस्था की जरूरत पर चर्चा हो रही है। ऐसे में उलेमा की जिम्मेदारी है कि वे इस्लामी शिक्षाओं की रोशनी में एक व्यावहारिक वैकल्पिक व्यवस्था की रूपरेखा पेश करें।उन्होंने समुदाय में प्राथमिकताओं की समझ विकसित करने पर जोर देते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में समुदाय के अस्तित्व और सुरक्षा का सवाल सबसे अहम है। इसलिए आपसी वैचारिक और मसलकी मतभेदों को पीछे रखते हुए सुधार और निर्माण के सामूहिक प्रयासों पर ध्यान देना होगा।उन्होंने कहा कि उलेमा की नेतृत्वकारी भूमिका केवल मस्जिदों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उन्हें समाज और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में मार्गदर्शन देना चाहिए। साथ ही समुदाय को भय, निराशा और मानसिक दबाव से बचाना भी उनकी जिम्मेदारी है। उलेमा को केवल समस्याएं गिनाने के बजाय उनके व्यावहारिक समाधान पेश करने पर ध्यान देना चाहिए।उन्होंने दावत-ए-दीन को भी उलेमा की प्राथमिकताओं में शामिल करने की अपील की और कहा कि इस्लाम का संदेश गैर-मुस्लिम समाज तक भी पहुंचाया जाना चाहिए। इसके लिए टकराव के बजाय संवाद, आपसी बातचीत और समझ-बूझ का माहौल तैयार करना समय की महत्वपूर्ण जरूरत है।

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के नेशनल सेक्रेटरी डॉ. रज़ी-उल-इस्लाम नदवी ने स्वागत भाषण में कहा कि विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े उलेमा मौजूदा चुनौतियों पर विचार करने, धार्मिक जिम्मेदारियों को समझने और उनके समाधान तलाशने के लिए एक मंच पर एकत्र हुए हैं। उन्होंने कहा कि आज उलेमा के लिए अपने दौर की बौद्धिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परिस्थितियों को समझना जरूरी है। साथ ही मतभेदों के बावजूद आपसी सहयोग और साझा कार्य की भावना को मजबूत किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि सम्मेलन में 7 विचार-विमर्श सत्र आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों के पहलुओं पर विस्तार से चर्चा होगी।

जमीयत अहले हदीस के अमीर मौलाना असगर अली इमाम महदी सलफी ने कहा कि आज हर पल नए चैलेंज और संघर्ष सामने आ रहे हैं, जिनका सामना ईमान और नेक अमल के जरिए किया जा सकता है। उन्होंने परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझने के लिए आत्ममंथन की जरूरत पर जोर दिया और इसके लिए सहाबा के दौर को आदर्श बताया।

दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर मोहसिन उस्मानी ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों का समाधान अल्लाह की मदद में है और अल्लाह की मदद तभी हासिल हो सकती है जब इंसान अपनी जिंदगी को अपने सृष्टि के उद्देश्य, यानी अल्लाह की इबादत के अनुरूप ढाले।जोधपुर विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर अख्तरुल वासे ने कहा कि आस्था और श्रद्धा के अंतर को समझना जरूरी है। उन्होंने तकफीर की प्रवृत्ति को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि मतभेद के बावजूद दूसरों की धार्मिक भावनाओं और श्रद्धा का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अतीत में भी समुदाय ने इससे अधिक कठिन परिस्थितियों का सामना किया है, इसलिए निराश होने के बजाय उम्मीद और हौसले के साथ काम करना चाहिए।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना फज़लुर्रहीम मुजद्दिदी ने कहा कि पैगंबरों को भी अपनी दावत के रास्ते में बड़े चैलेंज का सामना करना पड़ा। उन्होंने अपनी कौम तक उसकी भाषा में संदेश पहुंचाया। आज उलेमा को भी इसी तरीके को अपनाने की जरूरत है।

सम्मेलन के दूसरे सत्र में जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के नायब अमीर प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने ‘दीन की राह में रुकावटें और उनका समाधान’ विषय पर संबोधित किया। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. कासिम रसूल इलियास ने राजनीतिक बेवज़नी खत्म करने के मुद्दे पर, जबकि एपीसीआर के सचिव मोहम्मद वासिक नदीम खान ने मस्जिदों और मदरसों के सामने मौजूद चुनौतियों पर विचार रखे।कार्यक्रम के अंत में सम्मेलन के संयोजक मौलाना मोहम्मद असद फलाही ने प्रतिभागियों के सामने आवश्यक दिशा-निर्देश प्रस्तुत किए।

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