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Basit Nadwi
6 दिन ago
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ज़ोमैटो डिलीवरी से वेंटिलेटर तक: जमीयत के 21वें फिक़्ही इज्तिमा में आधुनिक ज़िंदगी के अहम सवालों पर क्या तय हुआ?

नई दिल्ली, 25 सितंबर 2026: इंटरनेट, ऑनलाइन डिलीवरी, बैंकिंग, इंश्योरेंस और आधुनिक मेडिकल तकनीक ने हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को पूरी तरह बदल दिया है। ऐसे में मुस्लिम समाज के सामने यह सवाल भी लगातार उठते रहे हैं कि इन आधुनिक व्यवस्थाओं में काम करते हुए शरीयत के नियमों का पालन किस तरह किया जाए।
इन्हीं समकालीन सवालों पर विस्तार से विचार करने के लिए जमीयत उलमा-ए-हिंद के इदारा-तुल-मबाहिस अल-फ़िक़्हिया के तत्वावधान में 23 से 25 सितंबर 2026 तक नई दिल्ली के मदनी हॉल, आईटीओ में 21वां तीन दिवसीय फिक़्ही इज्तिमा आयोजित किया गया।
इस इज्तिमा में देश के विभिन्न मदरसों, दारुल-इफ्ताओं और इस्लामी संस्थानों से 300 से अधिक मुफ़्ती और फुक़हा शामिल हुए। दारुल उलूम देवबंद, नदवतुल उलेमा, जामिया क़ासमिया शाहरी मुरादाबाद, मज़ाहिर उलूम समेत कई संस्थानों के विद्वानों ने समकालीन चिकित्सा, कारोबार, रोजगार और सामाजिक जीवन से जुड़े मसलों पर चर्चा की।
इस दौरान 260 से अधिक रिसर्च पेपर पेश किए गए और अलग-अलग सत्रों में आधुनिक दौर के कई महत्वपूर्ण सवालों पर शरीयत के नजरिए से विचार किया गया।

गर्भपात को लेकर क्या कहा गया?
इज्तिमा में मेडिकल क्षेत्र से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में गर्भपात भी शामिल रहा। स्वीकृत प्रस्ताव के मुताबिक, भ्रूण में नफ़्ख़-ए-रूह 120 दिन यानी चार महीने के बाद होता है। इससे पहले भ्रूण की धड़कन आदि को रूह फूंके जाने की निशानी नहीं माना गया।
आम परिस्थितियों में गर्भपात की अनुमति नहीं बताई गई है। हालांकि चार महीने पूरे होने से पहले कुछ वैध चिकित्सकीय या शरीयती कारणों की मौजूदगी में इसकी गुंजाइश बताई गई है। इनमें मां को असहनीय चिकित्सकीय परेशानी, स्तनपान करने वाले बच्चे की सेहत को गंभीर नुकसान का खतरा या भ्रूण में किसी बड़े दोष की मौजूदगी जैसी परिस्थितियां शामिल हैं।
चार महीने के बाद यदि गर्भ के कारण मां की जान को गंभीर खतरा हो, तो प्रस्ताव में दोनों की जान बचाने की हर संभव कोशिश पर जोर दिया गया है। मां की जान बचाने के लिए आवश्यक स्थिति में समय से पहले प्रसव या ऑपरेशन की अनुमति की बात कही गई है।

महिला डॉक्टर, गायनेकोलॉजी और अल्ट्रासाउंड
फिक़्ही इज्तिमा में महिला स्वास्थ्य से जुड़े सवालों पर भी चर्चा हुई। प्रस्ताव के अनुसार मुस्लिम महिला के लिए गायनेकोलॉजी या नर्सिंग की शिक्षा हासिल करना जायज़ है। जरूरत पड़ने पर मिश्रित मेडिकल संस्थानों में पढ़ाई की भी गुंजाइश बताई गई, हालांकि पहले महिलाओं के लिए उपलब्ध विशेष संस्थानों को प्राथमिकता देने की बात कही गई।
इसी तरह यदि महिला विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध हो तो महिला मरीज के इलाज या प्रसव के लिए पुरुष डॉक्टर से बचने की हिदायत दी गई है। लेकिन महिला विशेषज्ञ उपलब्ध न होने, पर्याप्त विशेषज्ञता न होने या असाधारण आर्थिक कठिनाई जैसी परिस्थितियों में पुरुष डॉक्टर से इलाज कराने की गुंजाइश बताई गई।
गर्भ की निगरानी और चिकित्सकीय आवश्यकता के लिए अल्ट्रासाउंड को भी जायज़ बताया गया, लेकिन संभव हो तो महिला डॉक्टर से कराने की हिदायत दी गई।
वेंटिलेटर और गंभीर रूप से बीमार मरीज
आधुनिक चिकित्सा में वेंटिलेटर और जीवन रक्षक मशीनों के इस्तेमाल से जुड़े सवाल भी फिक़्ही चर्चा का हिस्सा बने। खास तौर पर ऐसे मरीजों के मामले पर विचार हुआ जिनकी हालत बेहद गंभीर हो और जिन्हें आधुनिक मशीनों के सहारे जीवित रखा जा रहा हो।
इज्तिमा में इस बात पर जोर दिया गया कि किसी गंभीर या जानलेवा बीमारी से पीड़ित व्यक्ति का इलाज जानबूझकर छोड़ देना, ताकि उसकी मौत जल्दी हो जाए, जायज़ नहीं है। मेडिकल तकनीक के इस्तेमाल और इलाज से जुड़े मामलों में बीमारी की प्रकृति और वास्तविक चिकित्सकीय स्थिति को ध्यान में रखते हुए शरीयती और मेडिकल दोनों पहलुओं पर विचार जरूरी बताया गया।

डिलीवरी बॉय शराब का पैकेट पहुंचाए तो क्या होगा?
फिक़्ही इज्तिमा में आधुनिक डिलीवरी और गिग इकॉनमी से जुड़े सवाल भी प्रमुखता से उठे।
आज बड़ी संख्या में युवा ऑनलाइन डिलीवरी प्लेटफॉर्म के जरिए रोजगार हासिल कर रहे हैं। ऐसे में सवाल है कि अगर किसी डिलीवरी कर्मचारी को ऐसा सामान पहुंचाना पड़े, जिसे इस्लाम में हराम माना जाता है, तो उसका क्या हुक्म होगा?
प्रस्ताव में सामान्य डिलीवरी के अनुबंध के तहत सामान पहुंचाने को जायज़ बताया गया है। हालांकि अगर पहले से मालूम हो कि ऑर्डर में कोई हराम वस्तु शामिल है तो जहां तक संभव हो उससे बचने की हिदायत दी गई है।
खास तौर पर शराब आदि की डिलीवरी या परिवहन से मुसलमानों को बचने की सलाह दी गई है।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर डिलीवरी की नौकरी को नाजायज़ घोषित कर दिया गया है। बल्कि नौकरी की प्रकृति, सामान की जानकारी और कर्मचारी की भूमिका जैसे पहलुओं को ध्यान में रखने की बात कही गई है।

बैंक की नौकरी और ब्याज से जुड़ा सवाल
आधुनिक बैंकिंग भी चर्चा का अहम विषय रही। प्रस्ताव के मुताबिक अगर किसी कर्मचारी का मूल काम जायज़ है, लेकिन उसके काम के दौरान कुछ ऐसे अतिरिक्त कार्य करने पड़ते हैं जिनमें नाजायज़ पहलू शामिल हो सकते हैं, तो ऐसी नौकरी को मूल रूप से जायज़ माना जा सकता है। हालांकि कर्मचारी को ऐसे नाजायज़ कामों से यथासंभव बचने की कोशिश करनी चाहिए।
वहीं सूद आधारित योजनाओं की मार्केटिंग और लोगों को उसकी तरफ आकर्षित करने के मामले में स्पष्ट रूप से सख्ती दिखाई गई है।
अगर किसी सेल्समैन का मुख्य काम ही ब्याज आधारित योजना का प्रचार करना और ग्राहक को उसके लिए तैयार करना है, तो इसे नाजायज़ बताया गया है।
लेकिन यदि कर्मचारी का मूल काम जायज़ सामान या सेवा बेचना है और ग्राहक के पूछने पर वह केवल ब्याज आधारित फाइनेंसिंग की प्रक्रिया समझाता है, जबकि उसका उद्देश्य ग्राहक को ब्याज के कर्ज की तरफ आकर्षित करना नहीं है, तो ऐसी स्थिति में गुंजाइश बताई गई है।

वेबसाइट और सॉफ्टवेयर बनाना जायज़
डिजिटल दौर में वेबसाइट, ऐप और सॉफ्टवेयर बनाने वालों के लिए भी एक अहम सवाल है—अगर उनके बनाए सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल जायज़ और नाजायज़ दोनों तरह के कामों में हो सकता है, तो क्या ऐसी नौकरी जायज़ है?
फिक़्ही इज्तिमा के प्रस्ताव में वेबसाइट, सॉफ्टवेयर और दूसरे प्रोग्राम तैयार करने तथा उनकी खरीद-फरोख्त को जायज़ बताया गया है, भले ही उनका इस्तेमाल आंशिक रूप से ब्याज आदि के कामों में भी हो सकता हो।
इसी आधार पर ऐसी कंपनियों में नौकरी करने की भी गुंजाइश बताई गई है जिनका तैयार किया गया डेटा जायज़ और नाजायज़ दोनों तरह के कामों में इस्तेमाल हो सकता है।

बैंक या इंश्योरेंस कंपनी की इमारत में काम?
बैंक, सिनेमा हॉल या इंश्योरेंस कंपनी जैसी जगहों पर काम करने से जुड़े सवाल पर भी प्रस्ताव में अलग-अलग परिस्थितियों को ध्यान में रखा गया। बैंक या सिनेमा हॉल में बतौर आर्किटेक्ट, डेकोरेटर या फर्नीचर बनाने का काम करने की गुंजाइश बताई गई है, हालांकि इससे बचना बेहतर बताया गया।
इसी तरह बैंक या इंश्योरेंस कंपनी को जगह किराए पर देने की भी गुंजाइश बताई गई, लेकिन एहतियात को प्राथमिकता देने की बात कही गई है।

इंश्योरेंस को लेकर क्या रुख रहा?
आज के समय में स्वास्थ्य, वाहन और जीवन से जुड़ी इंश्योरेंस पॉलिसियां आम हो चुकी हैं। इनके शरीयती पहलुओं पर भी फिक़्ही विद्वानों के बीच लंबे समय से चर्चा होती रही है।
इज्तिमा में आधुनिक आर्थिक मामलों और ब्याज आधारित व्यवस्थाओं से जुड़े विभिन्न सवालों पर विचार किया गया। मकसद यह बताया गया कि समकालीन आर्थिक जरूरतों को समझते हुए शरीयत के सिद्धांतों के अनुरूप मार्गदर्शन तैयार किया जाए।

धार्मिक प्रतीकों और दूसरी वस्तुओं की बिक्री
इज्तिमा में गैर-मुस्लिम धार्मिक प्रतीकों से जुड़ी वस्तुओं की बिक्री पर भी चर्चा हुई। राखी, कड़ा, मंगलसूत्र और क्रिसमस ट्री जैसी गैर-मुस्लिम धार्मिक पहचान से जुड़ी वस्तुओं की बिक्री को मकरूह बताते हुए मुसलमानों को इससे बचने की हिदायत दी गई, वहीं संगीत और गाने-बजाने के उपकरणों की खरीद-फरोख्त को नाजायज़ बताया गया। प्रिंटिंग और ऑनलाइन सामग्री को लेकर भी दिशा-निर्देश
कुफ्र और नास्तिकता पर आधारित ऐसी सामग्री की लिखाई और छपाई को नाजायज़ बताया गया जिसका उद्देश्य उस विचार को प्रस्तुत या प्रचारित करना हो।
हालांकि फोटोस्टेट और प्रेस से जुड़े काम में ऐसी सामग्री की छपाई की गुंजाइश बताई गई, जिसमें उस तस्वीर या सामग्री को खुद उद्देश्य बनाना शामिल न हो।
हर नौकरी का हुक्म सिर्फ नाम से तय नहीं होगा
फिक़्ही इज्तिमा का एक अहम पहलू यह भी रहा कि किसी नौकरी या कारोबार को केवल उसके नाम से जायज़ या नाजायज़ तय करने के बजाय काम की वास्तविक प्रकृति, उद्देश्य, नीयत और उसके व्यावहारिक परिणाम को ध्यान में रखा जाए।
यानी किसी कंपनी में नौकरी करना अपने आप में एक जैसा हुक्म नहीं रखता। कर्मचारी की वास्तविक जिम्मेदारी क्या है, वह किस काम में सीधे तौर पर शामिल है और उसका काम किस उद्देश्य को पूरा कर रहा है—इन पहलुओं को भी देखा जाएगा।

अभी अंतिम विस्तृत गाइडलाइन आना बाकी
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है कि इन चर्चाओं का मतलब यह नहीं है कि हर मामले पर तुरंत कोई एक लाइन का फतवा जारी कर दिया गया है।
इज्तिमा में कई मुद्दों पर प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है, जबकि विस्तृत और अंतिम दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया आगे जारी रहेगी।
इदारा-तुल-मबाहिस अल-फ़िक़्हिया के कन्वीनर मौलाना अब्दुल मलिक रसूलपुरी के मुताबिक, स्वीकृत प्रस्तावों का पूरा पाठ संस्था की वेबसाइट imf-juh.in पर प्रकाशित किया जाएगा।
आधुनिक जिंदगी और शरीयत के बीच तालमेल की कोशिश
21वें फिक़्ही इज्तिमा की सबसे अहम बात यही है कि इसमें ऐसे सवालों पर चर्चा की गई जो आज लाखों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं।
एक तरफ ऑनलाइन डिलीवरी, डिजिटल सॉफ्टवेयर, बैंकिंग और इंश्योरेंस जैसी नई आर्थिक व्यवस्थाएं हैं, तो दूसरी तरफ वेंटिलेटर, अल्ट्रासाउंड और आधुनिक मेडिकल तकनीक जैसी स्वास्थ्य संबंधी जरूरतें।
इन तमाम मामलों में शरीयत के मूल सिद्धांतों को सामने रखते हुए नए दौर की परिस्थितियों को समझने और उनके लिए मार्गदर्शन तैयार करने की कोशिश इस फिक़्ही इज्तिमा में दिखाई देती है।
यही वजह है कि इस बैठक में हुई चर्चा सिर्फ मदरसों या धार्मिक संस्थानों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध उन लाखों मुस्लिम युवाओं, कर्मचारियों, कारोबारियों, डॉक्टरों और आम लोगों से है जो रोजाना आधुनिक तकनीक और आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा बनकर अपनी जिंदगी आगे बढ़ा रहे हैं।
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