लद्दाख़ में बढ़ी सियासी हलचल: LAB-KDA और सोनम वांगचुक पर एजेंडा भटकाने का आरोप, सिविल सोसाइटी फोरम ने मांगे तुरंत चुनाव!

लेह:22-10-2026
लद्दाख़ में संवैधानिक सुरक्षा और केंद्र सरकार के साथ चल रही बातचीत को लेकर अब क्षेत्रीय नेतृत्व के भीतर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। लेह में आयोजित Civil Society Forum of Ladakh की बैठक में वरिष्ठ नेताओं, धार्मिक प्रतिनिधियों और सिविल सोसाइटी से जुड़े लोगों ने Leh Apex Body (LAB), Kargil Democratic Alliance (KDA) और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की रणनीति पर गंभीर सवाल उठाए।
फोरम का आरोप है कि भूमि, रोज़गार और संस्कृति की सुरक्षा जैसे मूल मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं और आंदोलन का एजेंडा कुछ व्यक्तियों के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गया है। मंच ने दावा किया कि केंद्र के साथ बातचीत को बार-बार टालने, शर्तों में बदलाव और टकराव की रणनीति से आम लद्दाखी के हित प्रभावित हो रहे हैं।

फोरम के मुताबिक़, गृह मंत्रालय की ओर से रखे गए प्रस्ताव को पर्याप्त रूप से समझे बिना ख़ारिज करने के कारण 22 अक्टूबर को नई दिल्ली में प्रस्तावित अहम बैठक भी नहीं हो सकी।
हालांकि, इन आरोपों पर LAB-KDA और सोनम वांगचुक का पक्ष अलग है और वे लंबे समय से ठोस संवैधानिक गारंटी, छठी अनुसूची और राज्य का दर्जा जैसे मुद्दों पर स्पष्ट समाधान की मांग करते रहे हैं।
प्रतिनिधित्व पर भी उठे सवाल: Civil Society Forum का कहना है कि मौजूदा LAB और KDA अब लद्दाख़ के सभी ज़िलों और सामाजिक वर्गों की व्यापक आवाज़ का प्रतिनिधित्व नहीं करते। फोरम का तर्क है कि पूरे क्षेत्र के भविष्य का फैसला सीमित प्रतिनिधियों के स्तर पर नहीं होना चाहिए।
फोरम की प्रमुख मांगें:
🔹 लद्दाख़ में तत्काल पंचायत और LAHDC चुनाव कराए जाएं।
🔹 निर्वाचित परिषदों को भूमि, रोज़गार और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए अधिक अधिकार दिए जाएं।
🔹 Leh Apex Body का पुनर्गठन किया जाए और उसमें निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ धार्मिक संस्थाओं, महिलाओं, जनजातीय समुदायों और सीमा क्षेत्रों में रहने वाले घुमंतू समुदायों को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले।
लद्दाख आंदोलन में नई बहस: इस पूरे घटनाक्रम ने लद्दाख़ के आंदोलन के भीतर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दे दिया है। एक पक्ष छठी अनुसूची, राज्य का दर्जा और मज़बूत संवैधानिक सुरक्षा के बिना समझौते के ख़िलाफ है, जबकि दूसरा पक्ष तत्काल मिलने वाले अधिकारों और स्थानीय स्वशासन को मज़बूत करने की रणनीति को ज़्यादा व्यावहारिक मानता है।
यानी अब लड़ाई सिर्फ केंद्र बनाम लद्दाख़ की नहीं रह गई है। लद्दाख़ के भीतर भी यह सवाल तेज़ी से उभर रहा है कि आगे की रणनीति “सभी मांगें एक साथ पूरी होने तक संघर्ष” की हो या “पहले जो अधिकार मिल सकते हैं, उन्हें हासिल करके आगे बढ़ने” की।
आने वाले दिनों में यह अंदरूनी बहस लद्दाख़ की राजनीति और केंद्र के साथ बातचीत की दिशा पर बड़ा असर डाल सकती है।
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