भारतीय NGO ने UNHRC में सिंधु जल संधि की समीक्षा की मांग उठाई!

जिनेवा, 15 सितंबर: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 63वें सत्र में एक भारतीय ग़ैर-सरकारी संगठन (NGO) ने भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुई सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) की समीक्षा किए जाने की मांग उठाई है। संगठन का कहना है कि पिछले छह दशकों में क्षेत्र की जल-सुरक्षा परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आया है, इसलिए संधि का वर्तमान मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य में पुनर्मूल्यांकन जरूरी है।
दिल्ली स्थित इस NGO ने एजेंडा आइटम 3 के तहत सुरक्षित पेयजल और स्वच्छता के मानवाधिकार पर विशेष रैपोर्टेयर के साथ हुए संवादात्मक सत्र में मौखिक बयान दिया। संगठन ने कहा कि लोगों की पानी तक पहुंच का सीधा संबंध जीवन, स्वास्थ्य, भोजन, आवास, गरिमा और विकास जैसे मौलिक अधिकारों से है।
NGO ने अपने बयान में संयुक्त राष्ट्र द्वारा सुरक्षित और स्वच्छ पेयजल तथा स्वच्छता तक पहुंच को मौलिक मानवाधिकार के रूप में मान्यता दिए जाने का उल्लेख किया। संगठन के मुताबिक़, अंतरराष्ट्रीय जल समझौतों को इस तरह लागू किया जाना चाहिए कि वे संबंधित देशों को मानवाधिकारों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने में सक्षम बनाएं, न कि उनके रास्ते में बाधा पैदा करें।
संगठन ने कहा कि सिंधु जल संधि लंबे समय से भारत और पाकिस्तान के बीच अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण रही है, लेकिन इसे छह दशक से भी अधिक समय पहले तैयार किया गया था। तब से इस पूरे क्षेत्र में जल-सुरक्षा की परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं।
NGO ने बदलती परिस्थितियों में बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों का लगातार पीछे हटना, भूजल स्तर में कमी और नदियों के प्रवाह का तेज़ी से अनिश्चित होना जैसी चुनौतियों को प्रमुख कारण बताया। संगठन का कहना है कि इन बदलावों ने क्षेत्र की जल-सुरक्षा से जुड़ी परिस्थितियों को पहले की तुलना में काफी अलग बना दिया है।
अपने बयान में NGO ने यह भी कहा कि किसी अंतरराष्ट्रीय संधि के मौजूदा प्रावधानों या उनके कार्यान्वयन की वजह से संबंधित देशों को अपने अधिकार क्षेत्र में रहने वाले लोगों और समुदायों के प्रति मानवाधिकार संबंधी दायित्वों को पूरा करने से नहीं रोका जाना चाहिए।
संगठन ने समुदायों की जल-सुरक्षा को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर जोर देते हुए सिंधु जल संधि की समीक्षा को ज़रूरी बताया। साथ ही उसने इस बात का भी उल्लेख किया कि संधि इस समय भारत की ओर से abeyance (निलंबित स्थिति) में रखी गई है।
NGO ने अपने निष्कर्ष में कहा कि मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। संगठन के अनुसार, सीमा-पार जल संसाधनों के प्रबंधन की व्यवस्था में लोगों, उनकी गरिमा और मौलिक अधिकारों को केंद्र में रखा जाना चाहिए।
भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि और MEA का रुख
सिंधु नदी प्रणाली की नदियों के जल के इस्तेमाल और बंटवारे से जुड़े प्रावधानों वाली सिंधु जल संधि (IWT) पर भारत और पाकिस्तान ने 19 सितंबर 1960 को हस्ताक्षर किए थे।
हालांकि, 31 अगस्त को भारत ने सिंधु जल संधि की स्थिति और अंतरिम उपायों से संबंधित कथित तौर पर “अवैध रूप से गठित” मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration-CoA) द्वारा जारी किए गए नवीनतम “अवार्ड” को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस तथाकथित अवार्ड को ख़ारिज करते हुए कहा कि जिस मध्यस्थता न्यायालय ने इसे जारी किया, उसका गठन विश्व बैंक द्वारा संधि की शर्तों के स्पष्ट उल्लंघन में किया गया था।
MEA ने अपने बयान में कहा कि भारत इस तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय के अवार्ड को पूरी तरह ख़ारिज करता है, जिस तरह वह इस निकाय की ओर से पहले जारी किए गए बयानों को भी ख़ारिज करता रहा है।
विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत ने क़ानूनन इस “अवैध रूप से गठित” और तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय के अस्तित्व को कभी मान्यता नहीं दी है। भारत का लगातार यह रुख़ रहा है कि इस निकाय की स्थापना स्वयं सिंधु जल संधि का गंभीर उल्लंघन है।
MEA के अनुसार, इसी वजह से भारत इस निकाय के समक्ष कभी उपस्थित नहीं हुआ और उसके पहले के बयानों को भी स्वीकार नहीं किया है। मंत्रालय ने कहा कि इस तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय के पास भारत के संप्रभु निर्णयों पर फैसला देने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है।
विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि इस निकाय की ओर से अभी या भविष्य में दिए जाने वाले किसी भी बयान का भारत द्वारा अपनी परियोजनाओं के संबंध में की जाने वाली कार्रवाई पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
भारत ने यह भी दोहराया कि सिंधु जल संधि को abeyance में रखने का उसका फैसला प्रभावी रहेगा।
MEA का यह रुख़ उस समय सामने आया जब मध्यस्थता न्यायालय ने सिंधु जल संधि की “स्थिति” पर एक अवार्ड और रैटल हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्लांट (RHEP) से जुड़े अंतरिम उपायों पर एक आदेश जारी किया। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि भारत को संधि के तहत अपने दायित्वों का पालन करना चाहिए। इनमें पश्चिमी नदियों पर भारत की पनबिजली परियोजनाओं के डिजाइन और संचालन से संबंधित दायित्व भी शामिल हैं।
पहलगाम हमले के बाद भारत ने संधि को रखा है निलंबित
पिछले साल हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने कहा कि उसने अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में प्राप्त अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए सिंधु जल संधि को abeyance में रखने का फैसला किया है।
भारत के अनुसार, यह स्थिति तब तक बनी रहेगी जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देने की नीति को विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय तरीके से त्याग नहीं देता।
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