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Basit Nadwi
1 सप्ताह ago
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जामिया में छात्र आंदोलन: हॉस्टल की थाली से छात्रसंघ की बहाली तक, आख़िर क्यों सुलग रहा है कैंपस
जामिया में छात्र आंदोलन: हॉस्टल की थाली से छात्रसंघ की बहाली तक, आख़िर क्यों सुलग रहा है कैंपस?

Khurshid Rabbany, Editor, The Pillar India
नई दिल्ली। जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पिछले कुछ दिनों से चल रहा छात्र आंदोलन अब सिर्फ एक कैंपस विरोध नहीं रह गया है। हॉस्टल के खाने की गुणवत्ता और बुनियादी सुविधाओं को लेकर उठे सवालों से शुरू हुई नाराज़गी अब क़रीब दो दशक से बंद पड़े छात्रसंघ चुनावों की बहाली, छात्रों पर हुई अनुशासनात्मक कार्रवाई और कैंपस में छात्रों की प्रतिनिधित्व व्यवस्था के सवाल तक पहुंच गई है।
12 अक्टूबर से शुरू हुई अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल, धरना, प्रशासन और छात्रों के बीच बढ़ता तनाव, पुलिस की मौजूदगी, विपक्षी नेताओं का कैंपस पहुंचना, दीवारों पर लिखे विवादित नारे और शनिवार को छात्रों तथा सुरक्षा कर्मियों के बीच हुई झड़प, इन घटनाओं ने जामिया के विवाद को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का मुद्दा बना दिया है।
कहानी की शुरुआत आख़िर कहां से हुई?
मौजूदा छात्र आंदोलन को समझने के लिए कुछ हफ्ते पीछे जाना ज़रूरी है।
सितंबर में जामिया के हॉस्टलों में खाने की गुणवत्ता और स्वच्छता को लेकर छात्रों ने विरोध शुरू किया था। जम्मू-कश्मीर गर्ल्स हॉस्टल के छात्रों ने मेस के खाने में कथित तौर पर कीड़े मिलने, पहले सब्ज़ी में कांच का टुकड़ा मिलने और दूसरी खाद्य सामग्री को लेकर शिकायतें की थीं। इसके बाद लड़कियों के हॉस्टल में प्रदर्शन हुआ। विश्वविद्यालय ने जांच और सुधार के आश्वासन दिए।
इसके बाद एक अन्य हॉस्टल में दाल में छिपकली जैसा जीव मिलने का आरोप सामने आया। विश्वविद्यालय ने इस मामले की जांच के लिए फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी बनाई और सीसीटीवी फुटेज देखने की बात कही। छात्रों की ओर से खाने में कीड़े, अधपका भोजन और दूसरी समस्याओं की शिकायतें भी सामने आईं।
यहीं से एक बड़ा सवाल उभरने लगा, अगर छात्रों को हॉस्टल, पानी, शौचालय, क्लासरूम, लाइब्रेरी, लिफ्ट या खाने जैसी रोज़मर्रा की समस्याओं पर शिकायत करनी है, तो उनकी सामूहिक और निर्वाचित आवाज कहां है?
छात्रों का तर्क है कि जामिया में कोई निर्वाचित छात्रसंघ नहीं होने के कारण इन शिकायतों को संस्थागत रूप से उठाने वाला प्रतिनिधि मंच मौजूद नहीं है। यही शिकायत धीरे-धीरे छात्रसंघ की बहाली की पुरानी मांग के साथ जुड़ती चली गई।

क़रीब दो दशक से छात्रसंघ चुनाव नहीं
जामिया में छात्रसंघ चुनाव आख़िरी बार 2000 के दशक के मध्य में हुए थे। विश्वविद्यालय के मुताबिक़ 2006 में छात्रसंघ को समाप्त कर दिया गया था। प्रशासन का कहना है कि उस समय कैंपस में बार-बार हिंसक झड़पें, शिक्षकों पर हमले और शैक्षणिक गतिविधियों में व्यवधान जैसी घटनाएं होती थीं, जिसके बाद चुनाव बंद किए गए। विश्वविद्यालय यह भी कह चुका है कि 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट की कार्यवाही का निपटारा हुआ था, लेकिन अदालत ने जामिया को छात्रसंघ चुनाव कराने का निर्देश नहीं दिया था।
छात्रों की तस्वीर इससे अलग है। उनका कहना है कि क़रीब 20 साल तक निर्वाचित छात्रसंघ का न होना ख़ुद एक बड़ी लोकतांत्रिक कमी है। उनका सवाल है कि अगर विश्वविद्यालय में छात्र अपनी समस्याओं के लिए निर्वाचित प्रतिनिधि चुन सकते हैं, तो छात्रसंघ चुनाव क्यों नहीं हो सकते?
इसी मांग को लेकर पांच छात्रों ने 12 अक्टूबर को अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की।

छात्रों की मुख्य मांग क्या है?
आंदोलन के केंद्र में अब मुख्य रूप से तीन बातें हैं।
पहली, जामिया मिल्लिया इस्लामिया छात्रसंघ को बहाल किया जाए और चुनाव की स्पष्ट तारीख़ का ऐलान की जाए।
दूसरी, आंदोलन में शामिल छात्रों के ख़िलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई की समीक्षा और निर्दोष छात्रों की बहाली।
तीसरी, छात्रों की शिकायतों और कैंपस प्रशासन से जुड़े मुद्दों में छात्रों की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
छात्रों का कहना है कि सिर्फ़ कमेटियां बनाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें चुनाव के लिए स्पष्ट समयसीमा चाहिए।
प्रशासन ने क्या किया?
छात्रों के आंदोलन के बीच विश्वविद्यालय प्रशासन ने 18 अक्टूबर के आसपास सात सदस्यीय उच्चस्तरीय कमेटी बनाई। इसमें विश्वविद्यालय के वरिष्ठ डीन और प्रोफेसर शामिल हैं। कमेटी का उद्देश्य प्रदर्शनकारी छात्रों से बातचीत करना, उनकी मांगों की जांच करना और कैंपस में सामान्य स्थिति बहाल करने के उपाय सुझाना है।
लेकिन छात्रों की आपत्ति यहीं है।
प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि कमेटी में विश्वविद्यालय के अधिकारी और शिक्षक तो हैं, लेकिन शुरुआत में छात्रों का प्रतिनिधित्व नहीं था। इसलिए उनका सवाल था कि जिस छात्रसंघ की बहाली पर फैसला होना है, उस पर विचार करने वाली व्यवस्था में छात्रों की आवाज़ कितनी असरदार है?
हालांकि बाद में प्रशासन ने छात्रसंघ के संविधान का मसौदा तैयार करने वाली अलग प्रक्रिया में छात्र प्रतिनिधियों को शामिल करने की बात कही। 24 अक्टूबर को रजिस्ट्रार मोहम्मद महताब आलम रिज़वी ने कहा कि छात्र प्रतिनिधियों वाली ड्राफ्ट कमेटी संविधान का मसौदा तैयार करेगी और मसौदा मिलते ही चुनाव की घोषणा की जाएगी।
यही वह बिंदु है जहां प्रशासन और छात्रों के बीच मूल मतभेद दिखाई देता है, प्रशासन पहले संविधान और प्रक्रिया पूरी करना चाहता है, जबकि छात्र पहले चुनाव की निश्चित तारीख चाहते हैं।

फिर टकराव क्यों बढ़ा?
प्रदर्शन लंबा खिंचने के साथ कैंपस में तनाव बढ़ता गया। छात्रों ने धरना जारी रखा और भूख हड़ताल भी चलती रही। प्रशासन की तरफ़ से प्रदर्शन स्थल को ख़ाली करने और सामान्य शैक्षणिक गतिविधियां बहाल करने की कोशिशें हुईं।
24 अक्टूबर को हालात और बिगड़ गए। विश्वविद्यालय के अधिकारियों और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच बातचीत के दौरान तनाव बढ़ा और छात्रों तथा सुरक्षा कर्मियों के बीच टकराव हुआ। छात्रों ने आरोप लगाया कि प्रशासन उनके टेंट हटाने और भूख हड़ताल कर रहे छात्रों को वहां से ले जाने की कोशिश कर रहा था। विश्वविद्यालय का पक्ष है कि प्रदर्शनकारियों ने निर्धारित प्रदर्शन स्थल के बजाय दूसरे स्थान पर क़ब्ज़ा कर रखा था और सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए कार्रवाई की जा रही थी।
इसके बाद विश्वविद्यालय ने सभी कक्षाओं को अगले आदेश तक ऑनलाइन करने का फैसला किया। प्रशासन ने इसे छात्रों की सुरक्षा और कैंपस की स्थिति को देखते हुए एहतियाती क़दम बताया।

नेताओं की एंट्री ने बढ़ाई राजनीतिक गर्मी
आंदोलन के दौरान विपक्षी नेताओं की सक्रियता ने मामले को कैंपस से बाहर राजनीतिक मुद्दा बना दिया।
समाजवादी पार्टी के सांसद मोहिबुल्लाह नदवी छात्रों के समर्थन में जामिया पहुंचे। 23 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने उन्हें कैंपस के बाहर हिरासत में लिया। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद को भी छात्रों के प्रदर्शन में शामिल होने की कोशिश के दौरान हिरासत में लिया गया। बाद में नदवी को छोड़ दिया गया।
कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी और इमरान मसूद के कैंपस में प्रवेश को लेकर भी विवाद हुआ। जामिया के रजिस्ट्रार ने आरोप लगाया कि दोनों सांसद बिना अनुमति कैंपस में दाख़िल हुए। प्रशासन का आरोप है कि मसूद दीवार के रास्ते अंदर आए और प्रतापगढ़ी ने पीछे के गेट का लॉक तोड़कर प्रवेश किया। विश्वविद्यालय ने इस मामले में पुलिस शिकायत करने और कार्रवाई की बात कही है।
कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि इस मामले की रिपोर्ट गृह मंत्रालय को भेजी गई है और दोनों सांसदों के ख़िलाफ एफआईआर की तैयारी की जा रही है। हालांकि इस स्तर पर इसे प्रशासन का आरोप/प्रस्तावित क़ानूनी कार्रवाई ही माना जाना चाहिए; एफआईआर और आगे की क़ानूनी प्रक्रिया की स्थिति अलग से आधिकारिक रूप से स्पष्ट होना ज़रूरी है।
इमरान प्रतापगढ़ी ने छात्रों के आंदोलन का समर्थन किया और प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए। दूसरी तरफ़ विश्वविद्यालय ने बाहरी राजनीतिक हस्तक्षेप को कैंपस का माहौल बिगाड़ने वाला बताया। इस तरह छात्रसंघ की मांग अब राजनीतिक टकराव का हिस्सा भी बनती दिखाई देने लगी।

‘फ्री कश्मीर’ और ‘फ्री शरजील इमाम’ के नारों ने बदल दिया विमर्श
इसी बीच जामिया की दीवारों पर ‘Free Kashmir’ और ‘Free Sharjeel Imam’ जैसे नारे लिखे दिखाई दिए। इससे छात्रसंघ चुनाव की मांग से अलग एक नया राजनीतिक विवाद पैदा हो गया।
प्रदर्शनकारी छात्रों ने इन नारों से ख़ुद को अलग बताया और कहा कि उनका आंदोलन छात्रसंघ चुनाव की बहाली और छात्रों की समस्याओं से जुड़ा है। उनका आरोप है कि किसी शरारती तत्व ने ये नारे लिखे होंगे और इससे उनके आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश हो सकती है।
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी इन नारों का समर्थन करने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और ऐसे नारे लिखने वालों के ख़िलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी इन नारों की कड़ी निंदा की है। दूसरी ओर भाजपा ने इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस से सवाल किए हैं। यानी जिस आंदोलन की शुरुआत छात्रों की बुनियादी समस्याओं और प्रतिनिधित्व की मांग से हुई थी, उसके साथ अब राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े विवाद भी जुड़ गए हैं।

क्या जामिया का आंदोलन अकेला है?
नहीं, जामिया के आंदोलन को समझने में हाल ही में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का घटनाक्रम ख़ासा अहम है।
AMU में भी छात्रों ने छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर करीब 20 दिन तक आंदोलन किया। वहां भी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल हुई। आख़िरकार विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों की मांग मानते हुए छात्रसंघ चुनाव कराने का ऐलान कर दिया और प्रॉक्टर को भी बदल दिया। AMU ने 5 नवंबर 2026 को चुनाव कराने की तारीख़ का भी ऐलान किया गया।
दिलचस्प बात यह है कि AMU आंदोलन की शुरुआत भी छात्र सुविधाओं और मेस के खाने से जुड़ी शिकायतों के बीच हुई थी और धीरे-धीरे छात्रसंघ की अनुपस्थिति का सवाल उसके केंद्र में आ गया।
यही वजह है कि AMU का उदाहरण जामिया के छात्रों के लिए एक मिसाल बन गया है। छात्रों का तर्क है कि जब एक केंद्रीय विश्वविद्यालय लंबे अंतराल के बाद चुनाव करा सकता है, तो जामिया में चुनाव की प्रक्रिया शुरू करने में इतनी देरी क्यों?

असली सवाल अब क्या है?
जामिया का मौजूदा संकट सिर्फ यह नहीं है कि कुछ छात्र भूख हड़ताल पर बैठे हैं या प्रशासन उनसे बातचीत कर रहा है।
असल सवाल तीन स्तरों पर है।
पहला सवाल, प्रतिनिधित्व का:
क्या क़रीब दो दशक से बिना निर्वाचित छात्रसंघ के चल रहे विश्वविद्यालय में छात्रों को अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मिलना चाहिए?
दूसरा सवाल, प्रक्रिया का:
क्या चुनाव कराने से पहले संविधान और प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी करना ज़रूरी है, या पहले चुनाव की तारीख़ तय करके बाकी प्रक्रिया उसके साथ आगे बढ़ाई जा सकती है?
तीसरा सवाल, विश्वास का:
क्या प्रशासन और छात्रों के बीच इतना भरोसा बचा है कि बातचीत के जरिए समाधान निकल सके?
अभी दोनों पक्षों के जवाब अलग-अलग हैं।
छात्र कहते हैं, हमें आश्वासन नहीं, चुनाव की तारीख़ चाहिए।
प्रशासन कहता है, प्रक्रिया पूरी होगी, छात्रों को भी शामिल किया जाएगा और संविधान का मसौदा तैयार होने के बाद चुनाव की घोषणा की जाएगी।

आंदोलन की दिशा अब किस ओर?
24 अक्टूबर तक आते-आते जामिया में हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि कक्षाएं ऑनलाइन करनी पड़ीं। दूसरी तरफ भूख हड़ताल, धरना और छात्रसंघ की बहाली की मांग बनी हुई है। राजनीतिक नेताओं की आवाजाही और विवादित नारों ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है।
फिर भी इस पूरे घटनाक्रम के बीच मूल मुद्दे को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
एक तरफ हॉस्टल के खाने, स्वच्छता, पानी, शौचालय, क्लासरूम और दूसरी सुविधाओं को लेकर छात्रों की शिकायतें हैं। दूसरी तरफ छात्रों का यह सवाल है कि इन समस्याओं को सामूहिक रूप से उठाने के लिए उनके पास निर्वाचित छात्रसंघ क्यों नहीं है।
यानी मेस की थाली से शुरू हुआ असंतोष अब प्रतिनिधित्व की राजनीति तक पहुंच चुका है।
जामिया प्रशासन के सामने चुनौती सिर्फ इस आंदोलन को खत्म करने की नहीं है। चुनौती यह भी है कि छात्रों और प्रशासन के बीच विश्वास कैसे बहाल किया जाए और क़रीब दो दशक पुराने छात्रसंघ के सवाल का ऐसा समाधान कैसे निकले जिसे दोनों पक्ष स्वीकार कर सकें।
AMU ने फिलहाल चुनाव की तारीख़ घोषित कर एक रास्ता दिखा दिया है। अब निगाहें जामिया पर हैं, क्या यहां भी बातचीत किसी स्पष्ट चुनावी रोडमैप तक पहुंचेगी, या आंदोलन और टकराव का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा?
फिलहाल जामिया का सवाल सिर्फ ‘छात्रसंघ कब?’ नहीं है।
सवाल यह भी है कि एक विश्वविद्यालय अपने छात्रों की आवाज़ को किस रूप में संस्थागत जगह देता है, कमेटियों के ज़रिए, प्रशासनिक संवाद के ज़रिए या एक निर्वाचित छात्रसंघ के ज़रिए?
इसी सवाल का जवाब आने वाले दिनों में जामिया के आंदोलन की दिशा तय करेगा।
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