उर्दू अकादमी, दिल्ली के ज़ेरे इंतिज़ाम मुशायरा जश्न-ए-आज़ादी का आयोजन

हिंदी भवन में उर्दू का मुशायरा, यह संगम ही अपने आप में गंगा-जमुनी तहज़ीब की खूबसूरत मिसाल है: आतिफ़ रशीद

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नई दिल्ली। 22 अगस्त

उर्दू अकादमी, दिल्ली के तत्वावधान में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हिंदी भवन, आईटीओ, नई दिल्ली में एक भव्य “मुशायरा जश्न-ए-आज़ादी” का आयोजन किया गया। मुशायरे में देश के विभिन्न क्षेत्रों से ताल्लुक रखने वाले प्रसिद्ध शायरों ने भाग लिया और अपने चुनिंदा कलाम (काव्य) से श्रोताओं को आनंदित किया। इस अवसर पर विशेष अतिथियों के अलावा साहित्य एवं कला से जुड़ी हस्तियों और साहित्यप्रेमी श्रोताओं की बड़ी संख्या मौजूद थी।

कार्यक्रम के प्रारंभ में उर्दू अकादमी, दिल्ली के सचिव जनाब लेखराज ने मुख्य अतिथि जनाब आतिफ़ रशीद, पूर्व उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, भारत सरकार को पौधा भेंट कर उनका स्वागत किया। इसके बाद अकादमी के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं मोहम्मद हारून और उज़ैर हसन क़ुद्दुसी ने आदरणीय अतिथि जनाब फ़िरोज़ बख़्त, पूर्व चांसलर, मौलाना आज़ाद उर्दू यूनिवर्सिटी और विशिष्ट अतिथि जनाब अब्दुल माजिद निज़ामी, एडमिनिस्ट्रेटिव हेड व ग्रुप एडिटर, सहारा इंडिया मीडिया को पौधे भेंट कर उनका स्वागत किया तथा सचिव जनाब लेखराज ने मुशायरे में भाग लेने वाले सभी शायरों को फूल भेंट कर उनका गर्मजोशी से स्वागत किया।

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मुशायरे की अध्यक्षता की जिम्मेदारी हिंदी और उर्दू के प्रसिद्ध कवि जनाब दीक्षित दनकौरी को सौंपी गई, जबकि संचालन (निज़ामत) के दायित्व का निर्वहन प्रसिद्ध शायर जनाब एजाज़ अंसारी ने किया। तत्पश्चात सचिव उर्दू अकादमी, विशेष अतिथियों और शायरों ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर मुशायरे का औपचारिक उद्घाटन किया।

अकादमी के सचिव जनाब लेखराज ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उर्दू अकादमी हर साल स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मुशायरे का आयोजन इस भावना के साथ करती है कि देश की आजादी के मूल्य और महत्व को उजागर किया जाए और उन महान शहीदों, स्वतंत्रता सेनानियों तथा जांबाज सपूतों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाए, जिनके बलिदानों और संघर्षों के परिणामस्वरूप हमें आजादी की सौगात मिली। उन्होंने कहा कि आजादी की रक्षा करना और इसके मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सभी की साझी जिम्मेदारी है। उन्होंने दिल्ली सरकार की ओर से उर्दू अकादमी की साहित्यिक व सांस्कृतिक गतिविधियों और कार्यक्रमों के प्रोत्साहन की सराहना करते हुए कहा कि दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता और कला, संस्कृति व भाषा मंत्री, दिल्ली सरकार जनाब कपिल मिश्रा के सकारात्मक और उत्साहवर्धक प्रयासों के परिणामस्वरूप उर्दू अकादमी अपने साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों को और अधिक विस्तार एवं सुंदरता के साथ प्रस्तुत कर रही है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आयोजित होने वाला यह मुशायरा “हर घर तिरंगा” अभियान के तहत आयोजित किए जाने वाले महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में से एक है, जिसके माध्यम से राष्ट्रीय अखंडता और देशभक्ति की भावना को बढ़ावा दिया जा रहा है।

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जनाब फ़िरोज़ बख़्त ने उर्दू भाषा की व्यापक प्रकृति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उर्दू साझी संस्कृति (कंपोजिट कल्चर), प्रेम, सहनशीलता और आपसी मेलजोल की भाषा है। यह किसी एक धर्म या वर्ग की भाषा नहीं बल्कि भारत की साझी संस्कृति की प्रतिनिधि भाषा है। उन्होंने कहा कि उर्दू ने हमेशा विभिन्न संस्कृतियों और समाजों के बीच निकटता लाने का काम किया है। उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर इस मुशायरे के आयोजन की सराहना करते हुए दिल्ली सरकार और विशेष रूप से मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता के प्रयासों की तारीफ की।

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जनाब अब्दुल माजिद निज़ामी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि यह मुशायरा कई मायनों में विशेष महत्व रखता है। एक तो यह कि हम आजादी की 80वीं वर्षगांठ के अवसर पर इसका आयोजन कर रहे हैं, दूसरे यह कि जश्न-ए-आज़ादी को उर्दू भाषा व साहित्य के माध्यम से मनाया जा रहा है और तीसरे यह कि यह समारोह हिंदी भवन जैसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह हमारे लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि हमारे पूर्वजों ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए एक ऐसा समावेशी संविधान तैयार किया, जिसके कारण आज हम आजादी के आठ दशक पूरे होने के बाद भी अपनी भाषा और अपनी सांस्कृतिक परंपरा के साथ इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। उन्होंने इस मुशायरे की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा पर चर्चा करते हुए कहा कि जश्न-ए-आज़ादी का यह मुशायरा कभी भारत के सबसे प्रसिद्ध और बड़े मुशायरों में गिना जाता था, लेकिन अफसोस कि समय बीतने के साथ इसकी वह ख्याति और लोकप्रियता धीरे-धीरे कम होती गई। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इस ऐतिहासिक मुशायरे की महानता, परंपरा और खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः बहाल करने के लिए गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए। उन्होंने दिल्ली सरकार का ध्यान दिल्ली अकादमी की शासी परिषद (गवर्निंग काउंसिल) के पुनर्गठन की ओर आकर्षित करते हुए कहा कि उर्दू भाषा व साहित्य से संबंधित गतिविधियों, मुशायरों और अन्य साहित्यिक व सांस्कृतिक मामलों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए अकादमी को मजबूत और सक्रिय बनाना आवश्यक है। उन्होंने उर्दू अकादमी में लंबे समय से खाली पड़े पदों को भरने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

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मुख्य अतिथि जनाब आतिफ़ रशीद ने अपने संबोधन में कहा कि “हिंदी भवन में उर्दू का मुशायरा, यह संगम ही अपने आप में गंगा-जमुनी तहज़ीब की खूबसूरत मिसाल है।” उन्होंने कहा कि यह दृश्य भारत की साझी संस्कृति, भाषाई सौहार्द और गंगा-जमुनी परंपरा का बेहतरीन प्रतीक है। उन्होंने उर्दू के साथ होने वाले अन्याय का जिक्र करते हुए कहा कि कभी-कभी उर्दू के साथ अन्याय खुद उर्दू प्रेमियों की ओर से भी हो जाता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि उर्दू प्रेमी सरकार के साथ सकारात्मक रूप से कदम से कदम मिलाकर चलें, सरकार के अच्छे कदमों का स्वागत करें और उर्दू से संबंधित समस्याओं के समाधान के लिए रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाएं। उन्होंने कहा कि उर्दू अकादमी को उसकी गरिमा के अनुकूल जीवित रखना किसी एक व्यक्ति या संस्था की नहीं बल्कि हम सभी की साझी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि उर्दू किसी एक धर्म या वर्ग की भाषा नहीं बल्कि हर भारतीय की भाषा है और यदि हम सब मिलकर प्रयास करें तो उर्दू को उसकी खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः दिलाई जा सकती है।

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मुशायरे के अंत में अकादमी की ओर से कार्यक्रम के संचालक अतहर सईद ने अत्यंत विनम्रता, कुशलता और उत्कृष्टता के साथ संचालन के दायित्व का निर्वहन करते हुए अतिथियों, शायरों, श्रोताओं, आयोजकों और कार्यक्रम के प्रतिभागियों का हृदय से आभार व्यक्त किया। उनके धन्यवाद ज्ञापित करने के साथ ही जश्न-ए-आज़ादी का यह मुशायरा राष्ट्रीय अखंडता एवं आपसी प्रेम के संदेश के साथ संपन्न हुआ।

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