बिना ट्रायल जेल और न्याय की स्थिति पर असोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स ने आयोजित की सार्वजनिक चर्चा

New Delhi:25-Aug-2026
नई दिल्ली में असोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन of सिविल राइट्स यानी APCR की ओर से प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में “Jailed Without Trial: The Politics of Imprisonment” विषय पर एक सार्वजनिक चर्चा का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में कानूनी समुदाय के वरिष्ठ अधिवक्ताओं और सदस्यों ने हिस्सा लिया, जहां बिना ट्रायल के लंबे समय तक जेल में बंद रखने, कड़े कानूनों के इस्तेमाल और संवैधानिक अधिकारों व निष्पक्ष प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर गंभीर चर्चा की गई। कार्यक्रम का मुख्य फोकस छात्र कार्यकर्ताओं उमर खालिद और शर्जिल इमाम की बिना ट्रायल के लगभग छह साल से तिहाड़ जेल में जारी कैद पर रहा। इन दोनों को फरवरी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों का मुख्य साजिशकर्ता बताते हुए शुरुआती 2020 में UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया था।
चर्चा के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर रोशनी डाली कि कैसे लंबे समय तक प्री-ट्रायल कैद व्यक्ति के स्वतंत्रता के अधिकार, निर्दोष होने की धारणा, न्याय तक पहुंच और निष्पक्ष सुनवाई के संवैधानिक वादे को प्रभावित करती है। इसके अलावा जमानत की कार्यवाही के बढ़ते महत्व और कर्षक कानूनों के असर पर भी बात रखी गई। इस पैनल में एडवोकेट सलमान खुर्शीद, एडवोकेट संजय हेगड़े, एडवोकेट शाहरुख आलम, एडवोकेट प्रशांत भूषण, एडवोकेट निजाम पाशा और एडवोकेट वरीशा फरासत शामिल रहे, जबकि संचालन एडवोकेट अहमद इब्राहिम ने किया।
कार्यक्रम में एडवोकेट सलमान खुर्शीद ने कहा कि हम दर्द के इतने आदी हो चुके हैं कि अब न तो शिकायत करते हैं और न ही आवाज उठाते हैं। आज का मुद्दा सिर्फ उन दो व्यक्तियों का नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था और उसकी संरचना का है, जहां व्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला जा रहा है। एडवोकेट संजय हेगड़े ने अदालतों और व्यवस्था की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि उमर और शर्जिल जैसे लोग इस व्यवस्था के शिकार हैं और यदि अदालतें विफल होती हैं तो यह गाड़ी के ब्रेक फेल होने जैसा है, जिससे दुर्घटना अनिवार्य हो जाती है। एडवोकेट शाहरुख आलम ने पुलिस और राज्य की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि कानून के मुताबिक पुलिस का काम जांच करना, गिरफ्तार करना और अदालत में सबूत पेश करना है, जिसके बाद ही कोई दोषी साबित होता है।
एडवोकेट प्रशांत भूषण ने इस मामले की दुर्भावनापूर्ण प्रकृति पर जोर देते हुए कहा कि दोनों को छह साल से अधिक का समय हो गया है और अभी तक ट्रायल शुरू नहीं हुआ है, जबकि उन्होंने कभी भी हिंसा के जवाब में हिंसा का रास्ता न अपनाने की बात कही थी। एडवोकेट निजाम पाशा ने बलवंत सिंह के पुराने मामले का हवाला देते हुए कहा कि लोकतंत्र में असहमति की कीमत कुछ नागरिकों को अपनी स्वतंत्रता के रूप में चुकानी पड़ रही है। अंत में APCR ने रेखांकित किया कि लंबे समय तक बिना ट्रायल के कैद रखने के गंभीर परिणाम होते हैं, जिन्हें बाद में बरी होने पर भी पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता, इसलिए इस विषय पर निरंतर सार्वजनिक और कानूनी ध्यान देने की आवश्यकता है।
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