BRICS 2026: क्या डॉलर की बादशाहत को चुनौती दे रहा है नया वैश्विक गठजोड़? भारत के लिए क्या हैं फायदे और नुकसान?

नई दिल्ली: क्या आने वाले वर्षों में दुनिया की आर्थिक व्यवस्था बदलने वाली है? क्या अमेरिकी डॉलर की दशकों पुरानी बादशाहत को BRICS चुनौती दे सकता है? और अगर ऐसा होता है तो भारत के लिए इसका क्या मतलब होगा?
नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS Summit 2026 के बीच ये सवाल एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में हैं। भारत की अध्यक्षता में हो रही BRICS गतिविधियों में आर्थिक और वित्तीय सहयोग के साथ-साथ वैश्विक दक्षिण की भूमिका, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दे भी प्रमुख हैं। भारत ने 1 जनवरी 2026 से BRICS की अध्यक्षता संभाली है और 18वां शिखर सम्मेलन सितंबर 2026 में नई दिल्ली में आयोजित हो रहा है।

डॉलर की ताकत इतनी बड़ी क्यों है?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी डॉलर अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में बेहद महत्वपूर्ण मुद्रा बन गया। वैश्विक व्यापार, वित्तीय बाजार, विदेशी मुद्रा भंडार और अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था में डॉलर की बड़ी भूमिका रही है।
तेल व्यापार में भी लंबे समय तक डॉलर की प्रमुख भूमिका ने इसकी अंतरराष्ट्रीय मांग को मजबूत किया। यही वजह है कि दुनिया के कई देशों के केंद्रीय बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर को महत्वपूर्ण स्थान दिया।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कई देश इस व्यवस्था पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं। इसे आम तौर पर De-Dollarisation यानी डॉलर पर निर्भरता कम करने की प्रक्रिया कहा जाता है।

रूस पर प्रतिबंधों के बाद क्यों बढ़ी चिंता?
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर लगाए गए पश्चिमी आर्थिक प्रतिबंधों और रूसी विदेशी संपत्तियों को फ्रीज किए जाने ने कई देशों के बीच यह बहस तेज कर दी कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में किसी एक मुद्रा और वित्तीय प्रणाली पर अत्यधिक निर्भरता कितनी सुरक्षित है।
यहीं से स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था की चर्चा को नई गति मिली।
भारत, चीन, रूस और दूसरे BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की कोशिश इसी व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि BRICS ने डॉलर को खत्म करने का कोई तत्काल फैसला कर लिया है। असल मुद्दा विकल्प और आर्थिक सुरक्षा तैयार करने का है।

BRICS कितना बड़ा हो चुका है?
BRICS की शुरुआत BRIC के रूप में हुई थी, जिसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन शामिल थे। 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद इसका नाम BRICS हुआ।
इसके बाद 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात इसके पूर्ण सदस्य बने। जनवरी 2025 में इंडोनेशिया भी BRICS का पूर्ण सदस्य बन गया। इस तरह 2026 में BRICS के कुल 11 पूर्ण सदस्य हैं।

वर्तमान सदस्य हैं:
ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इंडोनेशिया।
भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार ये 11 देश दुनिया की करीब 49.5 प्रतिशत आबादी, लगभग 40 प्रतिशत वैश्विक GDP और करीब 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं।
यानी BRICS अब एक छोटा समूह नहीं रह गया है। इसका आर्थिक और रणनीतिक वजन लगातार बढ़ा है।

BRICS के Partner Countries भी महत्वपूर्ण
BRICS के विस्तार के साथ Partner Country का मॉडल भी विकसित हुआ है। भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार 2025 में बेलारूस, बोलीविया, कजाकिस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा और उज्बेकिस्तान को Partner Countries के रूप में शामिल किया गया था।
इसका मतलब है कि BRICS का प्रभाव सिर्फ उसके 11 पूर्ण सदस्यों तक सीमित नहीं है। कई अन्य विकासशील देश भी इस प्लेटफॉर्म के साथ सहयोग बढ़ा रहे हैं।

डॉलर को चुनौती देने के तीन रास्ते
1. स्थानीय मुद्राओं में व्यापार
BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की कोशिश सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक है।
उदाहरण के लिए भारत और रूस के बीच व्यापार में रुपये और रूबल के इस्तेमाल की संभावनाएं लंबे समय से चर्चा में हैं। इसका उद्देश्य हर लेन-देन में डॉलर की जरूरत को कम करना है।
अगर दो देश सीधे अपनी-अपनी मुद्राओं में व्यापार कर पाते हैं तो डॉलर की मध्यस्थ भूमिका कुछ हद तक कम हो सकती है।

2. वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था
BRICS देशों के बीच सीमा-पार भुगतान को आसान और अधिक स्वतंत्र बनाने के लिए वैकल्पिक वित्तीय तंत्रों पर चर्चा होती रही है।
यहां BRICS Pay जैसे प्रस्तावों का भी उल्लेख किया जाता है। लेकिन इसे एक पूरी तरह तैयार और SWIFT का तत्काल विकल्प मानना सही नहीं होगा। फिलहाल BRICS में भुगतान प्रणालियों के बीच सहयोग और स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन बढ़ाने पर जोर ज्यादा महत्वपूर्ण है।

3. सोने की ओर बढ़ता रुझान
दुनिया के कई केंद्रीय बैंकों की ओर से सोने की खरीदारी ने भी ध्यान खींचा है।
सोना किसी एक देश की मुद्रा नहीं है। इसलिए कुछ केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाने के लिए सोने का हिस्सा बढ़ा रहे हैं।
यह भी डॉलर से दूरी की व्यापक बहस का एक हिस्सा है, हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि केंद्रीय बैंक अचानक डॉलर को पूरी तरह छोड़ रहे हैं।

भारत का रुख क्या है?
यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल भारत का है।
क्या भारत अमेरिकी डॉलर को खत्म करना चाहता है?
ऐसा कहना सही नहीं होगा।
भारत की नीति ज्यादा व्यावहारिक दिखाई देती है। भारत एक तरफ BRICS के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वित्तीय सहयोग को बढ़ावा देता है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने बड़े व्यापारिक और रणनीतिक संबंध भी बनाए रखता है।

भारत का लक्ष्य किसी एक मुद्रा या देश को हटाकर दूसरी व्यवस्था थोपना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को अधिक बहुध्रुवीय और विविध बनाना है।
भारत की अर्थव्यवस्था के लिए डॉलर का महत्व अभी भी बहुत बड़ा है। भारतीय आईटी, फार्मास्यूटिकल, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर का अमेरिकी बाजार से गहरा संबंध है। इसलिए डॉलर के अचानक कमजोर होने से भारत को भी नुकसान हो सकता है।

क्या रुपया डॉलर की जगह ले सकता है?
निकट भविष्य में भारतीय रुपये का अमेरिकी डॉलर को पूरी तरह replace करना मुश्किल है।
डॉलर की ताकत सिर्फ अमेरिका की अर्थव्यवस्था की वजह से नहीं है। इसके पीछे विशाल वित्तीय बाजार, वैश्विक भुगतान व्यवस्था, अमेरिकी ट्रेजरी बाजार और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का भरोसा भी है।
लेकिन भारत रुपये की अंतरराष्ट्रीय भूमिका बढ़ाने की दिशा में काम कर सकता है।
अगर ज्यादा देश भारत के साथ रुपये में व्यापार करने के लिए तैयार होते हैं, तो इससे रुपये का अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल बढ़ सकता है और भारत की डॉलर पर कुछ निर्भरता कम हो सकती है।

क्या डॉलर की बादशाहत सच में खत्म हो रही है?
इस सवाल का जवाब फिलहाल नहीं है।
डॉलर आज भी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण मुद्राओं में से एक है। BRICS के विस्तार का मतलब यह नहीं है कि अगले दिन से दुनिया डॉलर में व्यापार करना बंद कर देगी।
असल बदलाव धीरे-धीरे हो सकता है।
एक ऐसी दुनिया की ओर बढ़ने की कोशिश हो रही है जहां अंतरराष्ट्रीय व्यापार सिर्फ एक मुद्रा या एक वित्तीय प्रणाली पर निर्भर न रहे।
यही वजह है कि BRICS में स्थानीय मुद्राओं, सीमा-पार भुगतान, वित्तीय सहयोग और बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था पर लगातार चर्चा हो रही है।

BRICS 2026 से दुनिया को क्या संकेत मिल रहा है?
नई दिल्ली में हो रहा BRICS Summit 2026 इस बात का संकेत जरूर देता है कि Global South की आवाज अब पहले से ज्यादा संगठित हो रही है।भारत, चीन, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और नए सदस्य देशों के साथ BRICS का आर्थिक और राजनीतिक दायरा काफी बढ़ चुका है।
लेकिन इसे “डॉलर का अंत” कहना जल्दबाजी होगी।
ज्यादा सटीक तस्वीर यह है कि दुनिया एक ऐसी वित्तीय व्यवस्था की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही है जिसमें कई मजबूत आर्थिक केंद्र हों और देशों के पास व्यापार तथा भुगतान के ज्यादा विकल्प हों।
भारत के लिए यही सबसे बड़ा अवसर भी है और चुनौती भी।

डॉलर को खत्म करना भारत का लक्ष्य नहीं है। भारत के लिए असली लक्ष्य है—रुपये को मजबूत करना, आर्थिक विकल्प बढ़ाना और बदलती वैश्विक व्यवस्था में अपने हितों को सुरक्षित रखना।
निष्कर्ष
BRICS की कहानी सिर्फ डॉलर बनाम रुपया की कहानी नहीं है। यह बदलती हुई वैश्विक शक्ति-संरचना की कहानी है। एक तरफ अमेरिका और डॉलर की दशकों पुरानी आर्थिक ताकत है, तो दूसरी तरफ BRICS जैसे समूह हैं जो वैश्विक दक्षिण के देशों को ज्यादा विकल्प देने की कोशिश कर रहे हैं।

क्या आने वाले वर्षों में डॉलर की हिस्सेदारी कम होगी?
क्या रुपया अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अपनी जगह मजबूत करेगा?
और क्या BRICS एक वास्तविक वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था तैयार कर पाएगा?
इन सवालों के जवाब आने वाले वर्षों में सामने आएंगे। लेकिन इतना तय है कि दुनिया की आर्थिक व्यवस्था अब पहले जैसी नहीं रह गई है।
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