अफगानिस्तान में तालिबान के 5 साल: भारत की व्यावहारिक कूटनीति और पाकिस्तान की रणनीतिक विफलता
भारत की नीति: ‘जन-केंद्रित दृष्टिकोण’ और व्यावहारिक संवाद
पाकिस्तान-तालिबान तनाव और भारत का रणनीतिक लाभ

New Delhi (20, Aug-2026)
15 अगस्त 2021 को काबुल पर तालिबान के नियंत्रण के बाद दक्षिण एशिया का भू-राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। अमेरिकी और नाटो बलों की वापसी के बाद तालिबान के दूसरे कार्यकाल (Taliban 2.0) की शुरुआत में सबसे बड़ा सवाल भारत के क्षेत्रीय सुरक्षा और राजनयिक संबंधों को लेकर था। तालिबान शासन के 5 साल पूरे होने पर तस्वीर यह साफ करती है कि भारत ने किसी जल्दबाज़ी या भावुकता के बजाय ‘सहानुभूतिपूर्ण और व्यावहारिक कूटनीति’ (Pragmatic Engagement) का रास्ता चुना, जिसने नई दिल्ली को अफगानिस्तान में एक अपरिहार्य और विश्वसनीय हितधारक के रूप में बनाए रखा है।
सुरक्षा और अधिकारों के दोहरे मोर्चे पर अफगान वास्तविकता
तालिबान के पिछले 5 वर्षों के शासन का विश्लेषण दो अलग-अलग ध्रुवों पर किया जाता है। एक तरफ बड़े पैमाने पर आंतरिक सशस्त्र संघर्षों में कमी आई है और केंद्रीय प्रशासनिक ढांचा मजबूत हुआ है, वहीं दूसरी तरफ महिलाओं की शिक्षा-रोजगार पर प्रतिबंध, राजनीतिक समावेशिता का अभाव और मानवाधिकारों से जुड़े विषय वैश्विक समुदाय के लिए गंभीर चिंता का कारण बने हुए हैं।
तालिबान शासन के इस दौर में अफगान जनता की प्राथमिकताएं केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं हैं; उन्हें आर्थिक स्थिरता, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और वैश्विक मुख्यधारा से जुड़ाव भी चाहिए।
भारत की नीति: ‘जन-केंद्रित दृष्टिकोण’ और व्यावहारिक संवाद

तालिबान की वापसी के बाद भारत ने काबुल में अपने दूतावास को अस्थायी रूप से बंद जरूर किया, लेकिन अफगान जनता के साथ अपने ऐतिहासिक रिश्तों को टूटने नहीं दिया। जून 2022 में भारत ने काबुल में एक ‘तकनीकी टीम’ (Technical Team) तैनात कर अपने राजनयिक उपस्थिति को फिर से बहाल किया।
भारत की अफगानिस्तान नीति मुख्य रूप से तीन स्तंभों पर आधारित है:
- मानवीय सहायता: भारत ने बिना किसी राजनीतिक शर्त के गेहूं, जीवनरक्षक दवाइयां, कोविड टीके और भूकंप राहत सामग्री सीधे अफगान नागरिकों तक पहुंचाई।
- विकास विरासत की सुरक्षा: भारत द्वारा निर्मित सलमा बांध (अफगान-भारत मैत्री बांध), जारंज-डेलाराम मार्ग, इंदिरा गांधी बाल चिकित्सालय और संसद भवन जैसी परियोजनाएं आज भी आम अफगानों के बीच भारत की छवि को एक सच्चे मित्र के रूप में पेश करती हैं।
- सुरक्षात्मक संवाद: भारत ने तालिबान के कार्यवाहक प्रशासन के साथ निरंतर तकनीकी व व्यापारिक स्तर पर संपर्क बनाए रखा है, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत-विरोधी आतंकवादी गुटों (जैसे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद) द्वारा अफगान भूमि के इस्तेमाल को रोकना है।
पाकिस्तान-तालिबान तनाव और भारत का रणनीतिक लाभ
ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान ने तालिबान का इस्तेमाल भारत के खिलाफ ‘रणनीतिक गहराई’ (Strategic Depth) हासिल करने के लिए किया था। हालांकि, तालिबान 2.0 के तहत स्थितियां पूरी तरह उलट चुकी हैं।
- डूरंड लाइन और TTP विवाद: डूरंड रेखा की सीमा पर झड़पों और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के मुद्दे पर इस्लामाबाद और काबुल के बीच गहरा तनाव पैदा हो चुका है। तालिबान सरकार ने पाकिस्तान के सीमावर्ती दावों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है।
- स्वतंत्र विदेश नीति: तालिबान अब किसी एक देश (विशेषकर पाकिस्तान) के नियंत्रण में रहने के बजाय भारत, चीन और मध्य एशियाई देशों के साथ स्वतंत्र संबंध बना रहा है।
पाकिस्तान की इस विफलता के विपरीत, भारत की गैर-हस्तक्षेपकारी और विकास-केंद्रित नीति ने उसे काबुल के नए शासकों के साथ भी एक संतुलनकारी बातचीत का अवसर दिया है।

चाबहार और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी: भविष्य की रीढ़
भारत के लिए अफगानिस्तान केवल एक सुरक्षात्मक ढांचा नहीं, बल्कि मध्य एशिया का प्रवेश द्वार है।
- चाबहार बंदरगाह: ईरान के चाबहार बंदरगाह के जरिए भारत ने पाकिस्तान को बाईपास करते हुए काबुल तक सीधे व्यापारिक पहुंच बनाई है। तालिबान प्रशासन ने भी चाबहार के माध्यम से भारत के साथ व्यापार बढ़ाने में गहरी दिलचस्पी दिखाई है।
- आर्थिक विकास की आवश्यकता: तालिबान के लिए अपने देश की चरमराती अर्थव्यवस्था को संभालने हेतु भारत की तकनीकी, ढांचागत और व्यापारिक भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ और भावी चुनौतियां
भारत ने अपनी वैश्विक साख हथियारों या सैन्य हस्तक्षेप से नहीं, बल्कि ‘सॉफ्ट पावर’ (Soft Power), मानवीय मूल्यों और दीर्घकालिक विकास सहयोग से बनाई है।
आने वाले समय में भारत के समक्ष मुख्य रणनीतिक चुनौतियां होंगी:
- तालिबान के साथ व्यापारिक और सुरक्षात्मक व्यावहारिक जुड़ाव बनाए रखना।
- महिलाओं के अधिकारों, समावेशी शासन और मानवाधिकारों पर वैश्विक मंचों पर सैद्धांतिक रुख पर कायम रहना।
- अफगान सरजमीं का इस्तेमाल भारत के खिलाफ न होने देने की गारंटी सुनिश्चित करना।
निष्कर्ष
तालिबान के 5 वर्षों के शासन ने यह साबित कर दिया है कि काबुल में सरकारें भले बदल जाएं, लेकिन भारत और अफगानिस्तान के लोगों के बीच का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ता अटूट है। भारत ने शुरुआती अनिश्चितताओं के बाद जिस संयम, परिपक्वता और व्यावहारिक दृष्टिकोण का परिचय दिया, उसने पाकिस्तान के नापाक मंसूबों को पछाड़ते हुए भारत को इस क्षेत्र में एक जिम्मेदार और प्रभावकारी शक्ति के रूप में पुनः स्थापित किया है।
Share this content:



Post Comment