जंतर-मंतर की घटना: मीडिया पर गुस्सा जायज़, पत्रकारों पर ग़लत!
नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए प्रदर्शन के दौरान मुख्यधारा (मेनस्ट्रीम) मीडिया के खिलाफ प्रदर्शनकारियों का गुस्सा खुलकर सामने आया। कई लोगों ने आरोप लगाया कि देश का एक बड़ा मीडिया वर्ग जनहित के मुद्दों की बजाय सत्ता समर्थक विमर्श और सांप्रदायिक बहसों को अधिक महत्व देता है। हालांकि इस विरोध का सबसे बड़ा असर मौके पर मौजूद टीवी चैनलों के रिपोर्टरों पर देखने को मिला, जिन्हें हूटिंग, धक्का-मुक्की और बदसलूकी का सामना करना पड़ा।
लोकतंत्र में मीडिया की आलोचना करना हर नागरिक का अधिकार है। किसी रिपोर्टिंग से असहमति हो सकती है, उसके खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराया जा सकता है और मीडिया संस्थानों से जवाबदेही भी मांगी जा सकती है। लेकिन किसी पत्रकार के साथ हिंसा, अभद्र व्यवहार या शारीरिक हमला किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं कहा जा सकता।

पत्रकारिता पर उठते सवाल और समाज की ज़िम्मेदारी
वरिष्ठ पत्रकार खुर्शीद रब्बानी का मानना है कि जंतर-मंतर पर जो दृश्य देखने को मिले, वे लोकतांत्रिक समाज के लिए चिंताजनक हैं। उनके अनुसार, किसी पत्रकार की रिपोर्टिंग पर सवाल उठाना, उसकी आलोचना करना या उसका बहिष्कार करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन कपड़े फाड़ना, गाली देना, धक्का-मुक्की करना या केवल “गोदी मीडिया” कहकर हिंसा का निशाना बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
उनका कहना है कि किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत तर्क और संवाद होते हैं, हिंसा नहीं। यदि असहमति का जवाब हिंसा से दिया जाएगा तो लोकतांत्रिक संस्कृति कमजोर होगी और संवाद की गुंजाइश लगातार घटती जाएगी।
मीडिया को भी करना होगा आत्ममंथन
लेख में यह भी कहा गया है कि मीडिया संस्थानों को अपनी भूमिका पर गंभीर आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। सरकार की हर बात का बिना सवाल समर्थन करने की प्रवृत्ति ने पत्रकारिता की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया है। जनता का भरोसा धीरे-धीरे बनता है, लेकिन एक बार टूट जाए तो उसे दोबारा हासिल करने में वर्षों लग जाते हैं।
दुनिया के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान जैसे BBC, Reuters, Associated Press और The New York Times भी आलोचनाओं का सामना करते हैं, लेकिन उनकी पत्रकारिता का मूल सिद्धांत सत्ता से सवाल पूछना और तथ्यों के आधार पर रिपोर्टिंग करना है, न कि किसी सरकार या दल का प्रवक्ता बनना।
लोकतंत्र में पत्रकारिता की भूमिका
प्रख्यात अमेरिकी पत्रकार Walter Cronkite ने कहा था, “Journalism is what we need to make democracy work.” अर्थात, “लोकतंत्र को सही ढंग से चलाने के लिए पत्रकारिता आवश्यक है।”
वहीं लेखक George Orwell का प्रसिद्ध कथन भी आज के दौर में बेहद प्रासंगिक माना जाता है: “Journalism is printing what someone else does not want printed; everything else is public relations.” यानी “पत्रकारिता वह है जिसे कोई छपने नहीं देना चाहता; बाकी सब जनसंपर्क है।”
निष्कर्ष
एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में असहमति को लोकतांत्रिक तरीके से व्यक्त करना हमारी जिम्मेदारी है। वहीं पत्रकारों का दायित्व है कि वे सत्ता या विपक्ष किसी के प्रभाव में आए बिना तथ्यों और सच के आधार पर अपनी भूमिका निभाएं।
पत्रकारों पर हिंसा पत्रकारिता को बेहतर नहीं बना सकती और पक्षपाती पत्रकारिता लोकतंत्र को मजबूत नहीं कर सकती। आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज संयम बनाए रखे और मीडिया अपनी विश्वसनीयता को पुनः स्थापित करने के लिए आत्ममंथन करे। तभी लोकतंत्र में संवाद, भरोसा और संस्थाओं की गरिमा सुरक्षित रह सकेगी।
— खुर्शीद रब्बानी
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
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