FCRA Bill पर सरकार का बड़ा क़दम: विरोध के बीच JPC को भेजने की तैयारी
Waqf के बाद FCRA पर बहस: क्या ईसाई-मुस्लिम संस्थानों पर बढ़ेगा सरकारी नियंत्रण?
FCRA Amendment Bill, 2026 अभी संसद के विचाराधीन है; यह क़ानून बनकर लागू नहीं हुआ है। वहीं 22 जून 2026 को संशोधित FCRA Rules अधिसूचित किए जा चुके हैं

New Delhi:11-08-2026
विदेशी फंडिंग और ग़ैर-सरकारी संगठनों (NGOs) से जुड़े Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 को लेकर संसद में जारी विवाद के बीच केंद्र सरकार ने अब इसे Joint Parliamentary Committee (JPC) के पास भेजने का रास्ता खोल दिया है। सरकार की ओर से JPC की प्रक्रिया पर विचार की सहमति ऐसे समय में सामने आई है, जब विपक्ष और विभिन्न सामाजिक-धार्मिक संगठनों की ओर से बिल के कई प्रावधानों पर गंभीर आपत्तियां उठाई जा रही हैं।यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बिल में विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले ऐसे संगठनों के लिए संपत्तियों के प्रबंधन और निपटारे से जुड़ी नई व्यवस्था प्रस्तावित है, जिनका FCRA प्रमाणपत्र रद्द हो जाता है, संगठन उसे सरेंडर कर देता है या कुछ अन्य परिस्थितियों में उसका प्रमाणपत्र समाप्त हो जाता है। इसके लिए Designated Authority की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है।
सरकार क्यों लाई है FCRA में बदलाव?
केंद्र सरकार का तर्क है कि विदेशी धन के इस्तेमाल में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना ज़रूरी है। सरकार चाहती है कि भारत में आने वाले विदेशी योगदान का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य और कानून के अनुरूप हो तथा ऐसी फंडिंग का दुरुपयोग न हो।सरकार के समर्थकों का कहना है कि विदेशी फंडिंग से जुड़े नियमों को मज़बूत करना राष्ट्रीय सुरक्षा और वित्तीय पारदर्शिता के लिहाज़ से ज़रूरी है। दूसरी ओर आलोचकों का सवाल है कि नए प्रावधान सरकारी नियंत्रण को ज़रूरत से ज्यादा बढ़ा सकते हैं।यही विवाद अब संसद की बहस से आगे बढ़कर JPC की संभावित जांच तक पहुंच गया है।
FCRA Amendment Bill 2026 को लेकर देश में बहस तेज़ है। सरकार इसे विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा से जोड़ रही है, जबकि विपक्ष और कुछ धार्मिक व नागरिक संगठनों को आशंका है कि प्रस्तावित प्रावधानों से सरकार को NGO और धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं की संपत्तियों पर ज्यादा नियंत्रण मिल सकता है।
विदेशी चंदे से चलने वाले NGOs, चैरिटी संस्थानों और धार्मिक-सामाजिक संगठनों के लिए Foreign Contribution (Regulation) Act यानी FCRA पहले से ही महत्वपूर्ण क़ानून है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेश से आने वाले धन का इस्तेमाल भारत के राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल न हो और उसकी प्राप्ति व खर्च में पारदर्शिता बनी रहे।

1976 से शुरू हुई कहानी:
FCRA की शुरुआत 1976 में हुई थी। बाद में इसे 2010 में नए क़ानून के रूप में लागू किया गया और 2020 में भी इसमें महत्वपूर्ण बदलाव किए गए। मौजूदा व्यवस्था के तहत विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले पात्र संगठनों को पंजीकरण और निर्धारित नियमों का पालन करना होता है।
2026 का प्रस्तावित संशोधन इसी व्यवस्था में आगे बदलाव करने की कोशिश है।सबसे बड़ी बहस; संपत्तियों पर Designated Authority का नियंत्रण,Bill की सबसे चर्चित व्यवस्था Designated Authority से जुड़ी है।
प्रस्तावित क़ानून के मुताबिक़ यदि किसी संगठन का FCRA registration रद्द होता है, वह registration surrender करता है या निर्धारित परिस्थितियों में उसका registration समाप्त हो जाता है, तो विदेशी योगदान और उससे बनाई गई संपत्तियां Designated Authority के अधीन जा सकती हैं। यह व्यवस्था कुछ परिस्थितियों में उन संपत्तियों पर भी लागू हो सकती है जो आंशिक रूप से विदेशी योगदान से बनाई गई हों।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना ज़रूरी है, यह सीधे तौर पर यह नहीं कहता कि किसी NGO की हर संपत्ति तुरंत सरकार की स्थायी संपत्ति बन जाएगी।
Bill में पहले provisional vesting की व्यवस्था है। यदि संगठन निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपना FCRA registration बहाल या renew करा लेता है, तो संपत्तियां और अप्रयुक्त विदेशी धन वापस किए जाने का प्रावधान है। यदि निर्धारित अवधि में registration बहाल नहीं होता, तभी permanent vesting की स्थिति बन सकती है।
स्थायी रूप से vest होने वाली संपत्तियों को सार्वजनिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने या उनकी बिक्री का रास्ता भी प्रस्तावित है। बिक्री से प्राप्त राशि Consolidated Fund of India में जमा कराने की बात कही गई है।

सरकार का तर्क क्या है?
सरकार का कहना है कि विदेशी फंडिंग के मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है। उसका तर्क है कि विदेशी धन का इस्तेमाल भारत के क़ानूनों और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप होना चाहिए और जिन संस्थाओं का registration समाप्त हो जाता है, उनकी विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के भविष्य को लेकर मौजूदा क़ानून में स्पष्ट प्रशासनिक व्यवस्था की ज़रूरत थी।
सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि प्रस्तावित व्यवस्था किसी एक धर्म या समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं है, बल्कि विदेशी फंड के नियमन को मज़बूत करने के लिए है।
फिर विरोध क्यों हो रहा है?
यही वह बिंदु है जहां विवाद शुरू होता है।आलोचकों का कहना है कि Designated Authority को संपत्तियों के प्रबंधन और संभावित निपटारे की इतनी व्यापक शक्ति देना सरकार के नियंत्रण को बढ़ा सकता है। उन्हें डर है कि किसी संस्था का FCRA registration खत्म होने पर वर्षों से चल रहे अस्पताल, स्कूल, चैरिटी सेंटर या अन्य सामाजिक संस्थान प्रभावित हो सकते हैं।
विशेष रूप से कुछ ईसाई संगठनों और नागरिक समाज समूहों ने आशंका जताई है कि प्रस्तावित व्यवस्था का असर धार्मिक और अल्पसंख्यक संस्थानों पर disproportionate रूप से पड़ सकता है। सरकार इन आरोपों को ख़ारिज करते हुए इसे समुदाय-विशेष के ख़िलाफ क़दम नहीं मानती।
क्या इसका असर मुस्लिम संस्थानों पर भी पड़ सकता है? यह सवाल भी स्वाभाविक रूप से उठ रहा है।
FCRA किसी एक धर्म के लिए बनाया गया क़ानून नहीं है। इसलिए यदि कोई मुस्लिम संस्था, ईसाई संस्था या किसी अन्य समुदाय से जुड़ा संगठन FCRA के दायरे में आता है और उसकी foreign-funded assets से संबंधित वही परिस्थितियां पैदा होती हैं, तो प्रस्तावित व्यवस्था उसके लिए भी प्रासंगिक हो सकती है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि Darul Uloom Deoband, Nadwatul Ulama, JUeH या JIH जैसी प्रत्येक संस्था स्वतः इस क़ानून के दायरे में आ जाएंगी। किसी संस्था पर वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि वह FCRA के तहत किस स्थिति में है, विदेशी योगदान प्राप्त करती है या नहीं, उसका registration क्या है और संबंधित संपत्ति किस धन से बनाई गई है। इसलिए इस मुद्दे पर धार्मिक पहचान के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय संस्था की FCRA स्थिति और संपत्ति के स्रोत को देखना अधिक उचित होगा।

क्या FCRA Bill 2026 पहले ही क़ानून बन चुका है? नहीं।
यह सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है। Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 को 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था और अभी यह संसद के विचाराधीन है। इसलिए इसके प्रस्तावित प्रावधानों को वर्तमान कानून की तरह प्रस्तुत करना सही नहीं होगा।
इसी बीच 22 जून 2026 को FCRA (Amendment) Rules, 2026 अधिसूचित किए गए हैं, जो अलग विषय है और लागू हो चुके हैं।
असली सवाल क्या है?
FCRA संशोधन की बहस को केवल “सरकार बनाम अल्पसंख्यक” के नज़रिए से देखना शायद अधूरा होगा।एक तरफ विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता, राष्ट्रीय सुरक्षा और धन के सही इस्तेमाल को सुनिश्चित करना सरकार की ज़िम्मेदारी है। दूसरी तरफ यह भी ज़रूरी है कि वैध रूप से अस्पताल, स्कूल, राहत और सामाजिक सेवा चला रहे संगठनों को केवल प्रशासनिक या प्रक्रियात्मक कारणों से disproportionate नुक़सान न हो। इसलिए असली चुनौती यही है कि विदेशी फंडिंग पर प्रभावी निगरानी और नागरिक संस्थाओं की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
FCRA Bill 2026 अभी संसद में है। आगे संसदीय बहस, संभावित संशोधन और अंतिम कानून ही यह तय करेंगे कि इसके प्रावधान किस रूप में लागू होते हैं।
फिलहाल इतना साफ है कि यह सिर्फ NGOs का मामला नहीं है, बल्कि यह विदेशी फंडिंग, सरकारी नियमन, धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं की स्वायत्तता और संपत्ति के अधिकार से जुड़ी एक बड़ी क़ानूनी बहस है।
Shaffan Ansari
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